बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद .. यह कहावत खूब कही जाती है। बंदर अदरक के स्वाद को लेकर भले कुछ भी नजरिया हो। लेकिन, उसे बांज का बीज खूब भाता है। बंदरों का समूह बांज के बीजों को चट कर रहा है।
ऐसे में जंगल में बांज के नए पौधों को तैयार होने के लिए ही समस्या बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ आबादी क्षेत्र के करीब बांज की पत्तियों (पशुओं को चारे के लिए) काटा जा रहा है। इससे वहां नए बीज बनने और फिर पौधे तैयार होने की स्थिति बदतर हो गई है।
बांज की प्रजाति कई चुनौतियों का सामना कर रही है। बांज के क्षेत्र में चीड़ की घुसपैठ हो रही है। इसके अलावा जंगल और आबादी दोनों क्षेत्रों में बांज के नए पौधे तैयार होने में भी समस्या आ रही है।
दक्षिण वृत्त की वन संरक्षक डा. तेजस्विनी पाटिल कहती हैं कि केवल मौसम का परिवर्तन ही नहीं बल्कि बॉयोटिक प्रेशर (पशुओं के लिए चारा, वनों की आग, कटान आदि) के कारण भी वनस्पतियों पर खतरा मंडरा रहा है।
डा. पाटिल के मुताबिक बांज के बीज बंदरों को बेहद पसंद हैं। जहां भी वसा युक्त बांज के बीजों बंदरों को दिखता है, वह चट करने में लग जाते हैं। ऐसे में बीज कम होने से पूरी प्रक्रिया (बीज से पौधे और फिर वृक्ष बनना) ही प्रभावित हो रही है।
आबादी वाले इलाके के करीब बांज के सामने और चुनौती है। ग्रामीण पशुओं के चारे के लिए बांज के पत्तियों बड़े स्तर पर लापिंग (कटान) करते हैं, जिसके कारण कई जगह केवल लकड़ी के खंभे जैसे वृक्ष दिखाई देते हैं।
पत्तियां न होने या बेहद कम होने पर पेड़ के विकास, उनसे बीज आदि बनने का चक्र ही पूरा नहीं हो पा रहा है। इससे भी नए पौधे के बनने में समस्या आ रही है। कुछ संरक्षण के प्रयास किए जा रहे हैं। इसी तरह भाबर क्षेत्र में भी हल्दू के सामने चुनौती है।
वन अनुसंधान नर्सरी के प्रभारी वन क्षेत्राधिकारी मदन बिष्ट कहते हैं कि बायोटिक प्रेशर के कारण कई प्रजातियों के तैयार होने में संकट आ रहा है। इसमें पहाड़ की भी प्रजाति शामिल हैं।