रामनगर। कुमाऊंनी कवि लेखक स्वर्गीय मथुरादत्त मठपाल ने अपनी दुदबोली कुमाऊंनी को समर्पित होकर तीन वर्ष पहले ही शिक्षक की अपनी नौकरी से सेवानिवृत्ति ले ली थी। सेवानिवृत्ति के बाद किसी सरकारी मदद की बाट जोहने के बजाय पेंशन से ही कुमाऊंनी त्रैमासिक पत्रिका दुदबोली निकाली।
कुमाऊंनी कवि-लेखक मथुरादत्त मठपाल का जन्म 29 जून 1941 को अल्मोड़ा जिला के भिकियासैंण ब्लॉक के नौला गांव में हुआ। शुरुआत में उन्होंने हिन्दी में बहुत सी रचनाएं रचीं। सन 1985 से कुमाऊंनी साहित्य रचना शुरू की। कवि सम्मेलनों से उनकी पहचान कुमाऊंनी साहित्यकारों से बढ़ी। वर्ष 1997 में विनायक इंटर कॉलेज, भिकियासैंण से शिक्षक की नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर वे पूर्णत: कुमाऊंनी साहित्य सेवा में जुट गए। वर्ष 2000 से उन्होंने कुमाऊंनी में ‘दुदबोलि’ पत्रिका निकालनी शुरू की। शुरुआत में दुदबोलि 60 पृष्ठों में निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका थी। इसके 24 अंकों के हजारों पृष्ठों में कुमाऊंनी गीत, कविता कथाएं, साहित्य प्रकाशित हुआ। सन् 2006 से यह पत्रिका करीब 350 पन्नों की वार्षिकी बनकर निकलने लगी। इसके लगभग 2700 से अधिक पृष्ठों में कुमाऊंनी, नेपाली, गढ़वाली लोकसाहित्य को स्थान मिला है। सन 1989-90 और 91 में 3 क्षेत्रीय भाषायी सम्मेलन अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और नैनीताल में आयोजित करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पूरे कुमाऊं में मठपाल ने दर्जनों कवि सम्मेलन को आयोजित कराने में सहयोग किया। 9 मई 2021 में इनका निधन हुआ है। इसके बाद दुदबोली दिल्ली से नियमित रूप से निकल रही है।
22 किताबों को प्रकाशित करायी गई
स्व. मठपाल के पुत्र नवेंदु मठपाल ने बताया कि उनके पिता ने सबसे पहले कुमाऊंनी के 3 बड़े कवियों शेर सिंह बिष्ट (शेरदा अनपढ़) की ‘अनपढ़ी’ 1986 और गोपाल दत्त भट्ट की ‘गोमती गगास’ 1987 और हीरा सिंह राणा कि ‘हम पीर लुकाते रहे’ 1989 नाम से किताबों को हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशित किया। उन्होंने स्वयं के चार काव्य संकलन प्रकाशित किए, जिनमें आङ-आङ चिचैल है गो’, ‘पै मैं क्यापक क्याप के भैटुन, फिर प्योलि हंसैं, मनख-सतसई, राम नाम भौत ठुल (अप्रकाशित काव्य) आदि हैं।
कई पुस्कारों से हुए थे सम्मानित
मथुरादत्त मठपाल की प्रतिभा विद्वत समाज में बहुत सराही गयी। उन्हें 1988 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ द्वारा सुमित्रानन्दन पंत नामित पुरस्कार, 2011 में उत्तराखंड भाषा संस्थान देहरादून ने डॉ. गोविंद चातक पुरस्कार, 2012 में शैलवाणी सम्मान, साहित्य अकादमी नेशनल एकेडमी ऑफ लैटर्स द्वारा वर्ष 2014 में साहित्य अकादमी भाषा सम्मान से चारू चंद्र पाण्डे के साथ संयुक्त रूप से सम्मानित किया। कुमाऊंनी भाषा साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति कसार देवी अल्मोड़ा ने 2015 में शेर सिंह बिष्ट अनपढ़ कुमाऊंनी कविता पुरस्कार दिया। चंद्र कुंवर बर्तवाल सम्मान से उनको अगस्तमुनि में अगस्त 2021 मरणोपरांत सम्मानित किया गया।