अंतरराष्ट्रीय पांडुलिपि विशेषज्ञ और हिमालयन सोसायटी फार हैरिटेज एंड आर्ट कंजरवेशन के निदेशक अनुपम साह का कहना है कि भारत में करीब 70 से 80 लाख पांडुलिपियां हैं। इनमें अधिकतर विज्ञान, ज्योतिष, गणित और प्लांट मेडिसिन पर आधारित हैं। इन्हीं पुरानी पांडुलिपियों का आधार लेकर आज नई-नई खोजें हो रही हैं। इन पांडुलिपियों की जानकारी के लिए विदेशों से कई रिसर्चर भारत आ रहे हैं।
श्री साह के मुताबिक पांडुलिपियों से काफी महत्वपूर्ण जानकारियां मिल रही हैं। अधिकतर दवाओं को बनाने में इन पांडुलिपियों का सहारा लिया जा रहा है। पांडुलिपियों में पुराणों, ग्रंथासार की भरमार है। कई पांडुलिपियां मठों से संदर्भित भी हैं। तंत्र विद्या से संबंधित पांडुलिपियां तो हैं, लेकिन वह उन्हीं लोगों के पास हैं, जो इस काम को करते हैं या इसमें पारंगत हैं। ऐसी पांडुलिपियां संग्रहालयों में नहीं आई हैं।
उन्होंने कहा कि पांडुलिपियों का सहारा लेकर ही कलाकार शनिदेव, भगवान शंकर, अग्नि उपकरण, अग्नि पैदा करने की विधि आदि की कल्पनाएं अपने मन के भीतर संजोकर उन्हें चित्रित करता है। आर्टिस्ट उच्चकोटि के ऑब्जर्वर होते हैं।
कार्यशाला में कराया पांडुलिपियों का रिव्यू
राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के सहयोग और हिमालयन सोसायटी फार हैरिटेज एंड आर्ट कंजरवेशन की ओर से चल रही पांडुलिपि संरक्षण कार्यशाला मंगलवार को भी जारी रही। संस्था के निदेशक और अंतरराष्ट्रीय पांडुलिपि विशेषज्ञ अनुपम साह ने कार्यशाला में आए प्रशिक्षुओं के द्वारा संरक्षित की गई पांडुलिपियों की जानकारी लेकर उनका रिव्यू कराया। निदेशक अनुपम साह ने बताया कि 20 दिनों में प्रशिक्षुओं ने काफी ज्ञान अर्जन किया है। अगले चार दिनों में उनकी छोटी-मोटी गलतियों को दूर कराया जाएगा।