नैनीताल। कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों के लिए फसलों में लगने वाले फंगल रोगों की पहचान और उनके वैज्ञानिक प्रबंधन पर एक विस्तृत तकनीकी मार्गदर्शिका जारी की है। डॉ. निर्मला भट्ट और डॉ. अनिल चंद्रा की ओर से तैयार रिपोर्ट में किसानों को रोग के लक्षणों की सही पहचान, उपयुक्त फफूंदनाशक के चयन और वैज्ञानिक छिड़काव तकनीक अपनाने की सलाह दी गई है ताकि फसल को होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
रिपोर्ट के अनुसार, कई किसान रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर बिना सही पहचान किए फफूंदनाशकों का प्रयोग कर देते हैं। इससे न केवल रोग का प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाता बल्कि उत्पादन लागत बढ़ने के साथ आर्थिक नुकसान भी होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि रोग नियंत्रण की पहली शर्त सही पहचान है। इसके बाद रोग के अनुरूप तकनीकी साल्ट वाले फफूंदनाशक का चयन और अनुशंसित मात्रा में उसका प्रयोग करना आवश्यक है। केवीके के वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की है कि किसी भी फफूंदनाशक का उपयोग स्थानीय कृषि वैज्ञानिकों अथवा कृषि विभाग की सलाह के अनुसार ही करें।
तेज धूप में न करें दवा का प्रयोग
रिपोर्ट में कॉन्टैक्ट और सिस्टमिक फफूंदनाशकों की कार्यप्रणाली, ट्रायजोल एवं स्ट्रोबिल्यूरिन समूह की दवाओं की उपयोगिता और विभिन्न ब्रांडों में प्रयुक्त तकनीकी साल्ट की जानकारी भी दी गई है। वैज्ञानिकों ने सलाह दी है कि रोग के शुरुआती चरण में ही अनुशंसित मात्रा में पर्याप्त पानी के साथ छिड़काव किया जाए और तेज धूप के दौरान दवा का प्रयोग करने से बचा जाए।