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समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा रही है कुमाऊं की

Sun, 08 May 2016 12:50 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी।
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कुमाउंनी संस्कृति बचाने का संदेश - फोटो : अमर उजाला
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हल्द्वानी। न कोई ऐसा ज्ञान है न ही ऐसा कर्म है। जो नाटक में परिलक्षित नहीं होता है। नाटक एक संपूर्ण कला है। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच में मंचित कथा कुमाऊं की नाटक ने इसे सिद्ध कर दिखाया है। नाटक में जहां खस, चंद, गोरखा, कत्यूर और ब्रिटिश शासन में हुए उत्पीड़न का दर्द बयां किया गया। वहीं उत्तराखंड राज्य गठन के बावजूद समृद्ध और गौरवशाली उत्तराखंड के पलायन का दर्द भी देखने को मिला। कथा कुमाऊं की नाटक में कुमाऊं के 1300 साल के इतिहास, संस्कृति, तीज, त्योहार पर्व, पर्यावरण संरक्षण का विस्तृत चित्रण किया गया। मुख्य अतिथि डा. इंदिरा हृदयेश द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ अस्तित्व नाट्य कला विकास समिति के बैनर तले दिखाए गए नाटक में तमाम नाट्य और कला संस्थाओं ने सहयोग किया।
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वैदिक काल के बाद खस राजाओं का शासन कुमाऊं में रहा। लेकिन राजवंश से शुरू हुए नाटक में चंद, गोरखा, कत्यूरी और ब्रिटिश हुकूमत द्वरारा जनता पर किए गए तमाम अत्याचार, उन पर लगाए गए तरह-तरह के कर आदि ने लोगों को भीतर से झकझोर कर रख दिया। कूटनीतिज्ञ हर्ष देव जोशी जिसने चंद राजवंश के खात्मे के लिए गोरखों को आमंत्रित कर उनका राज यहां स्थापित कराया वही अंत में उपेक्षित होने पर उन्होंने ही गोरखों के खिलाफ अंग्रेजों की मदद की। नाटक में कुमाऊं की वास्तु, काष्ठ कला, जोहार, दारमा, व्यास, चौदास की संस्कृति की झलक भी देखने को मिली। कुमाऊं वासियों की दैनिक जीवन चर्या को बखूबी रंगमंच पर मंचित किया गया।

करीब 100 कलाकारों की टीम के सभ सदस्यों ने अपने किरदार को बखूबी अंजाम दिया। आकर्षक लाइटिंग व्यवस्था के बीच एक के बाद एक दृश्य मंचित किए गए। इनमें झोड़ा, चांचरी, होली, रामलीला, हरेला सभी का समावेश था और सभी में कुमाऊं के तात्कालिक हालातों पर बनाए गए गीतों को समावेश देखने को मिला। ऐपण जहां कत्यूरी शासन में यहां प्रचलन में आया वहीं गांवों में हुड़किया बौल, देव डांगर, खेती किसानी का जीवंत चित्रण हुआ। दो हजार से अधिक दर्शकों से खचाखच भरे उत्थान मंच परिसर में कुमाऊं सांस्कृतिक धरोहरों, विरासतों से भी नई पीढ़ी को रूबरू कराया गया।
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हरीश चंद्र पांडे द्वरा निर्देशित और घनश्याम भट्ट उर्फ कुमाऊं का नाना पाटेकर के सह निर्देशन में कलाकारों में अपनी प्रतिभा से लोगों को रोमांचित कर दिया। नैनीताल, अल्मोड़ा, कौसानी जैसे पर्यटक स्थलों को अंग्रेजों की एशगाह के रूप में दिखाया गया। स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में महात्मा गांधी के साथ उमड़ पड़ी कुमाऊं वासियों की भीड़ और उनके देशप्रेम की झलक देेखने लायक थी। पलायन को बेहद चिंताजनक बताते हुए देश की सुरक्षा और अस्तित्व के लिए पलायन रोकने जाने पर खास फोकस रहा। उत्तराखंड आंदोलन में मुजफ्पर नगर रामपुर रोड तिराहा, मसूरी, खटीमा कांड के दृश्यों को भी मंचित किया गया। नाटक मंचन के सभी दृश्यों का पार्श्व संचालन राज्यगीत के रचयिता हेमंत बिष्ट और मंच संचालन डा. प्रदीप उपाध्याय ने किया।

बागेश्वर से शुरू हुई कुली बेगार आंदोलन का मंचन दर्शकों के अंतर्मन को झकझोर गया। बगैर पारिश्रमिक के कुमाऊं के लोगों से अंग्रजों द्वारा कराए जाने वाले कुली बेगार प्रथा के खिलाफ एकजुट हुई जनता के सामने अंग्रेजों को घुटने टेकने पड़ेष कुली बेगार की आड़ में पटवारी और गाव के प्रधान द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों का भी मंचन किया गया। 

पहली बार कथा कुमाऊं की नाटक में दीप प्रज्ज्वलन का नायाब तरीका देखने को मिला। जिसमें पूर्व वित्त मंत्री डा. इंदिरा हृदयेश को रंगीन छतरी ओढ़ाकर दीप प्रज्ज्वलन स्थल पर लाया गया। कार्यक्रम में विधायक बंशीधर भगत, मेयर डॉ. जोगेंदर रौतेला,  पार्षद शोभा बिष्ट, हेमंत बगड्वाल, प्रदीप बिष्ट, सीसीआरडी दिल्ली के हरीश जोशी, लीला पांडे, रश्मि, भावना भट्ट, दिनेश कुंजवाल, डॉ. राजेश पालीवाल समेत तमाम लोग मौजूद थे।

कथा कुमाूऊं की नाटक में सह निर्देशक घनश्याम भट्ट ने कई किरदारों का रोल निभाया और डंगरिया की भूमिका में उन्होंने लोगों का खूब मनोरंजन किया। वहीं बुजुर्ग प्रेमा जोशी ने झोड़ा, होली और हरेला जैसे दृश्यों से रोमांचित कर दिया। दशरथ-कैकई संवाद में किरन की भूमिका को भी खूब सराहा गया।

हल्द्वानी। अस्तित्व नाट्य कला विकास समिति के बैनर तले पहली बार मंचित नाटक कथा कुमाऊं की नाटक ने जहां नई पीढ़ी को अपने अतीत को जानने और उससे सीख लेने को प्रेरित किया वहीं उत्तराखंड के मौजूदा शासक वर्ग को इस नाटक से नसीहत लेने की सीख भी दी। नाटक में दिखाया गया कि कैसे-कैसे शूरवीर, तानाशाह चले गए लेकिन वह भी जनता को डिगा नहीं सके। शासकों को जनता की सेवा और उनकी भलाई के लिए आगे भेजा जाता है। लेकिन जब शासक वर्ग स्वार्थ और निजी हितों तक सीमित रह जाता है तो उसे जनता राजगद्दी से जमीन में लाने का दं भी रखती है।

खस, चंद, गोरखा, कत्यूर वंशजों और ब्रिटिस शासकों की मनमानी भी जनता के सामना नहीं चली। यही नहीं उत्तराखंड राज्य आंदोलन में भले ही तमाम लोगों ने अपनी जान गंवाई। मां बेटियों को बेइज्जत किया गया लेकिन जनता के सामने शासक वर्ग को झुकना ही पड़ा और 9 नवंबर 2000 को 27 वें राज्य के रूप में अलग उत्तराखंड अस्तित्व में आया। लेकिन राज्य गठन के बाद भी बढ़ता पलायन आज के शासकों के लिए खुली चुनौती है। पलायन यों ही बढ़ता गया तो देश की सीमाओं को जबरदस्त खतरा पैदा हो सकता है। शासक वर्ग को इसके लिए सोचना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश में रहते हुए उत्तराखंड उसका उपनिवेश बनकर रह गया तो राज्य की मांग उठी लेकिन अभी राज्य में भी जनता के हित नैपथ्य में ही हैं। इसे शासक वर्ग को गंभीरता से लेना होगा।


कथा कुमाऊं की नाटक में दिखाया गया कि कुमाऊं के मूल निवासी कोल थे जिन्हें बाद में लाला लाजपत राय ने शिल्पकार नाम दिया। लेकिन कुमाऊं में जाति, धर्म, संप्रदाय का कभी झगड़ा रहीं रहा। यहां सभी को बराबर सम्मान दिया जाता है। किसी जाति-धर्म का हो जागर लगाने वाले दास के भी पैर छुए जाते हैं। सभी को सम्मानजनक शब्दों से संबोधित किया जाता है।  
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