नैनीताल। कुमाऊं में खड़ी होली का समृद्धशाली इतिहास है। यहां की खड़ी होली गायकी हास्य, करुण, शृंगार और विभत्स आदि रसों से भरी है। होल्यारों का दर्द है कि आजकल के बहुसंख्यक यू-ट्यूबर खड़ी होली की मूल गायकी का स्वरूप बिगाड़ रहे हैं। ऐसे में युवाओं को मूल होली के संरक्षण को आगे आना होगा। सोशल मीडिया के माध्यम से भी लोगों तक होली गायकी के मूल को पहुंचना होगा।
चंपावत के होल्यार नागेंद्र जोशी का कहना है कि चंद वंशीय शासन में मथुरा से आए तत्कालीन राज दरबारी कवियों ने कुमाऊं में खड़ी होली की शुरुआत की। राजधानी परिवर्तन के साथ ही होली की यह विधा फैलती रही है। वर्तमान सोशल मीडिया के दौर में निजी स्वार्थ व हास-परिहास में यू ट्यूबर होली की मूल गायकी का स्वरूप बिगाड़ रहे हैं, जो चिंता का विषय है।
अल्मोड़ा के होल्यार रूप सिंह गैड़ा ने कहा कि कुमाऊंनी खड़ी होली में वेदों से संबंधित वेदांत की होली, नायक नायिका का हास परिहास आदि सब कुछ है। अंत में होली को मथुरा को विदा किया जाता है। इस खड़ी होली गायकी की शुरुआत आमला एकादशी के चीर बंधन के बाद होती है।
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त नैनीताल निवासी जहूर आलम का कहना है कि कुमाऊं में मूल होली के खत्म होने तथा कीचड़, गोबर व कपड़ा फाड़ होली शुरू होने के दौर में युगमंच ने 27 वर्ष पूर्व होल्यारों के लिए कार्यशाला शुरू की।
चंपावत से आई होल्यार कृतिका जोशी ने बताया कि घर व प्रांगण तक सीमित रहने वाली महिला होली से जुड़े होल्यारों के शहर के बाहर प्रस्तुति बदल रहे समाज का प्रमाण है। महिला होल्यारों को और सुअवसर मिलने चाहिए। महिलाओं को भी होली के मूल को जीवंत रखने में सहभागी बनना होगा।