कुमाऊं विवि के हिंदी विभाग और सोसायटी फॉर एन्डेंजर्ड लैंग्वेजेज लखनऊ के सहयोग से हरमिटेज भवन में भाषा प्रलेखन एवं शब्दकोष निर्माण विषयक छह दिनी कार्यशाला शुरू हो गई है।
उद्घाटन के मौके पर कुविवि के कुलपति प्रो. होशियार सिंह धामी ने कहा कि उत्तराखंड की अपनी कोई भाषा नहीं है, इसकी वजह कुमाऊंनी और गढ़वाली का मानकीकरण न होना है। कुलपति ने इन भाषाओं को नई तकनीकी से जोड़ने और मानकीकरण करने पर जोर दिया।
प्रो. धामी ने संकटग्रस्त भाषाओं को इंटरनेशनल फांटिंग अल्फाबेट (आईपीए) से जोड़ने की अपील की। उन्होंने सोसायटी फॉर एन्डेंजर्ड लैंग्वेजेज लखनऊ और कुविवि के हिंदी विभाग द्वारा विलुप्त हो रही भाषाओं के संरक्षण एवं दस्तावेजीकरण करने के लिए आयोजित की जा रही कार्यशाला की सराहना की।
लखनऊ विवि के भाषा विज्ञान विभाग की प्रोफेसर कविता रस्तोगी ने कहा कि उनका लक्ष्य विलुप्त हो रही भाषाओं का कोष निर्माण करना है। डॉ. रस्तोगी ने कहा कि लुप्त हो रही बोली और भाषाओं को लिपिबद्ध करना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है।
डीएसबी परिसर के कला संकायाध्यक्ष प्रो. भगवान सिंह बिष्ट ने कहा कि कुमाऊंनी में एक शब्द के ध्वनि के अनुसार कई अर्थ होते हैं, इसलिए ध्वन्यात्कम प्रतिलेखन में ध्वनि का अर्थ महत्वपूर्ण है। हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. नीरजा टंडन ने कहा कि देश के साथ ही उत्तराखंड की कई बोलियां विलुप्त हो रही हैं, इसलिए इनका संरक्षण जरूरी है।
कार्यशाला की मुख्य संयोजिका प्रो. चंद्रकला रावत ने अतिथियों का स्वागत कर कार्यशाला की रूपरेखा प्रस्तुत की। कार्यशाला में पद्मश्री प्रो. शेखर पाठक, प्रो. उमा भट्ट, प्रो. मानवेंद्र पाठक, प्रो. नीता बोरा शर्मा, डॉ. शशि पांडे, गढ़वाल मंडल के पूर्व आयुक्त अजय नबियाल, डॉ. विष्णु कुमार सिंह, डॉ. सुमेघा शुक्ला, अजय कुमार, डॉ. शीला रजवार, शोध छात्र राजेश प्रसाद, भावना आदि मौजूद थे।