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राज्य आंदोलनकारियों के आरक्षण पर जजों के फैसले अलग-अलग

Fri, 23 Jun 2017 11:21 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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चंडीगढ़ कोर्ट, हाईकोर्ट, अदालत, न्यायालय - फोटो : file photo
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सरकारी नौकरियों में राज्य आंदोलनकारियों को दस प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण के मामले में एक ही खंडपीठ के दो न्यायाधीशों के निर्णय अलग-अलग रहे हैं। एक न्यायाधीश ने क्षैतिज आरक्षण को सही माना है तो दूसरे न्यायाधीश का निर्णय है कि क्षैतिज आरक्षण विधि सम्मत नहीं है।
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शुक्रवार को खंडपीठ ने मामला लार्जर बैंच को भेजा। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि अब यह मामला किसी तीसरे न्यायाधीश को भी भेजा जा सकता है और यह भी हो सकता है कि मुख्य न्यायाधीश तीन न्यायाधीशों की बैँच को यह मामला सौँपे।

इन दॉ मेटर ऑफ अपाइंटमेंट आफ एक्टिविस्ट व अन्य में दायर जनहित याचिका में कहा गया था कि सरकार की ओर से दो अलग-अलग शासनादेश जारी कर राज्य आंदोलनकारियों को सरकारी नौकरियों में दस प्रतिशत का क्षैतिज आरक्षण दिया जा रहा है। यह गलत है।
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2011 से चल रहे इस मामले में न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया एवं न्यायमूूर्ति यूसी ध्यानी की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। शुक्रवार को खंडपीठ ने इस मामले में अपना फैसला सुनाया। खंडपीठ ने कहा कि दोनों जजों के निर्णय में भिन्नता है, इसलिए प्रकरण को लार्जर बैंच को भेजा जा रहा है।

न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण देने के लिए राज्य सरकार की ओर से जारी सभी शासनादेशों को संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करार देते हुए निरस्त कर दिया है।

न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी ने कहा कि राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण देने के लिए जारी शासनादेशों में संविधान के किसी प्रावधान का उल्लंघन नहीं हुआ है, इसलिए आरक्षण विधि सम्मत है। 

हाइकोर्ट के विधि विशेषज्ञ बताते हैं कि फैसले में अलग-अलग मत आने के बाद मुख्य न्यायाधीश के पास अब दो विकल्प है। पहला कि वह फैसले को किसी तीसरे न्यायाधीश को भेज दें। तीसरा न्यायाधीश जिसके तथ्य को सही बताएंगे उसे फिर अंतिम आदेश माना जाएगा।

दूसरा, मुख्य न्यायाधीश तीन अन्य न्यायाधीशों की पीठ का गठन कर मामले को रेफर कर दें। तीन न्यायाधीशों की पीठ जो फैसला देगी उसे माना जाएगा।  पूर्व में कोर्ट ने सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। जिस पर उन्होंने शुक्रवार को अपना फैसला सुनाया।
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