‘हजरात! खुदा का शुक्र है और आप बुजुर्गों की दुआएं हैं कि बाबू रमजान पार्टी अपने 62वें साल का आज 22वां अजीमुश्शान प्रोग्राम लेकर आपकी खिदमत में हाजिर हैं। इस वक्त बाबू रमजान पार्टी की घड़ी के मुताबिक दो बजकर 10 मिनट हो चुके हैं और सहरी का आखिरी वक्त बाबू रमजान पार्टी के ई-नक्शे के मुताबिक तीन बजकर 33 मिनट पर है....। ’ इंदिरानगर मोहम्मदी चौक से रात के दो बजे नसीम अहमद और अन्य साथियों की लाउडस्पीकर पर गूंजती यह आवाज रोजेदारों को सुनाई देती है।
यह सिलसिला 62 साल से चल रहा है। इसका नाम है बाबू रमजान पार्टी। 10-12 लोगों का यह समूह रोजेदारों को सहरी के लिए जगाकर खिदमत अंजाम दे रही है। इस समय रमजान पार्टी का संचालन नसीम अहमद कर रहे हैं। नसीम बताते है कि बाबू रमजान पार्टी का गठन 1956 में खेल-खेल में हुआ था। बाबू रऊफ बेग पेंटर और एनाउंसर जलील अहमद नुमाइश खत्म कर वापस आ रहे थे।
उसी दिन रमजानुल मुबारक का चांद दिखा था। उन्होेंने माइक से सहरी में लोगों को उठाने के लिए एलान शुरू कर दिया। उस वक्त के जामा मस्जिद में रहे पेश-ए-इमाम ने बुलाकर कहा कि इस तरह लोगों को सहरी के लिए उठाना बहुत अच्छा काम है। अगर आप हर रोज इस तरह रोजेदारों को उठाओगे तो आपको नेकियां मिलेंगी। तब से यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। उसी महीने (1981) आठवें रोजे को जलील अहमद साहब का इंतकाल हो गया था। उसके बाद पार्टी की कमान नजीर खान ने संभाली।
25 साल से पार्टी की खिदमत कर रहे नसीम अहमद का कहना है कि 61 साल तक पार्टी नई बस्ती से खिदमत कर रही थी, पर सड़कों के तंग होने पर अबकी इसकी शुरूआत मोहम्मदी चौक से रात के एक बजे होती है। सबसे पहले सदस्यों के एकत्र होने के बाद तिलावते कलाम-ए-पाक पढ़ने के बाद पार्टी का आगाज होता है।
नसीम बताते हैं कि चाहे कड़ाके की सर्दी हो या मूसलाधार बारिश पार्टी रोजेदारों की खिदमत करती रहती है। पार्टी के सचिव नाजिम हुसैन के अलावा हाजी गफूर हलवाई, हाजी इमरान, अब्दुल वाजिद, जमील अहमद, मो. साजिद, सरताज आलम, डॉ. नसीम अहमद, शहनवाज मलिक, अतिक शाबरी, भूरे खां पूरे रमजान सक्रिय रहते हैं।
आज भी अपने कलाम में बाबू को याद करते हैं।
बाबू रमजान पार्टी के सदस्य आज भी अपने कलाम में बाबू के इंतकाल के बाद भी ये कलाम में याद करते हैं। ‘ठंडी-ठंडी थी रातें बरसता था पानी फिर भी खालिक की थी मेहरबानी’ और ‘बाबू आता था तुमको उठाने, भूल जाने के काबिल नहीं है वक्त सहरी है, ऐ रोजेदारों भूल जाने के काबिल नही है।’