नैनीताल। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर भले ही सरकार हर साल करोड़ों रुपये के बजट को ठिकाने लगाती हो लेकिन पर्यावरण को बचाने के लिए ठोस कदम उठाने के बजाय दोहरे मापदंड अपनाती है, जिसका लाभ बिल्डर और माफिया आसानी से उठा लेते हैं। यदि समय रहते जल, जंगल और जमीन को बचाने की ठोस पहल नहीं हुई तो मनुष्य बूंद-बूंद पानी को तरस जाएगा। यह कहना है पर्यावरणविद व विश्व वानिकी संस्थान वियाना के पूर्व अध्यक्ष प्रो. अजय रावत का।
विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर अमर उजाला से बातचीत में प्रो. रावत ने कहा कि जंगलों के अवैध कटान का सबसे अधिक असर पानी की उपलब्धता पर पड़ा है। नीति आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए प्रो. रावत ने बताया कि वर्ष 2011 में हुए सर्वे में यह बात साफ हुई कि मसूरी और देवप्रयाग में स्प्रिंग वाटर (धारों का पानी) में क्रमश: 20 प्रतिशत और 50 प्रतिशत की कमी हुई है। अब 2021 है लेकिन सरकारें नहीं चेती, उल्टा माफिया संस्कृति पनपने लगी। प्रो. रावत कहते हैं कि वर्तमान में यदि पहाड़ के पर्यावरण को बचाना है तो बिल्डरों और बोरिंग के लिए प्रभावी नीति बनानी होगी। कहते हैं कि नैनीताल, भीमताल, रामगढ़, मुक्तेश्वर के बाद अब बिल्डरों की पहुंच जंगलियागांव से लेकर दूरस्थ क्षेत्र हरीशताल तक हो गई है।
बिल्डरों को लाभ देने के लिए जंगल की परिभाषा बदली
प्रो. रावत का कहना है कि बिल्डरों को लाभ देने के लिए पिछले साल 19 फरवरी को एक नोटिफिकेशन जारी कर जंगल की परिभाषा ही बदल दी। बताया कि वर्ष 1980 वन अधिनियम के तहत यदि कहीं पर झाड़ियां हों, दो पेड़ हों तो उसे भी जंगल की श्रेणी में शामिल किया जाता था, लेकिन सरकार ने इसे बदलकर साफ कर दिया कि सिविल सोयम वन भूमि में दस हजार वर्ग किमी से कम भूमि पर मौजूद वनों को जंगल नहीं माना जाएगा। प्रो. रावत बताते हैं कि जब उन्होंने और उनके साथी विनोद पांडे ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की तो सरकार ने इसे दस से घटाकर पांच हजार वर्ग किमी कर दिया। मामला न्यायालय में विचाराधीन है।
जंगलों को बचाने के लिए जैविक खेती की जाए
प्रो. रावत कहते हैं कि यदि पर्यावरण को बचाना है तो बिल्डरों पर अंकुश लगे और जंगलों में भवन निर्माण को लेकर ठोस नियम बनाए जाएं। जंगलों को बचाने के लिए पलायन को रोकते हुए व्यापक पैमाने पर जैविक खेती की जाए। ग्रामीणों को इसका प्रशिक्षण मिले और सरकार जैविक उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराएं। जल प्रबंधन के लिए परम्परागत पेयजल स्रोतों, नौले, धारे, गजार, सिमारों को पुनर्जीवित किया जाए और रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य किया जाए।
प्राकृतिक स्पंज हैं वेटलैंड्स
नैनीताल। पर्यावरणविद प्रो. अजय रावत का कहना है कि नदी, नालों, झीलों और गधेरों को जिंदा रखना है तो वेटलैंड्स को जिंदा रखना होगा। वह कहते हैं कि वेटलैंड्स ऐसे प्राकृतिक स्पंज हैं जो अतिवृष्टि होने पर पानी को सोख लेते हैं और बाद में यही पानी जमीन के भीतर से रिसते हुए झीलों तालाबों नदियों तक पहुंचता है। प्रो. रावत इस बात को लेकर चिंतित हैं कि सरकार ने आज तक न तो वेटलैंड्स चिन्हित किए और ना ही उन्हें संरक्षित करने को कोई नीति बनाई।
इन नदी, नालों की भी सुध लो सरकार
नैनीताल। नदियों और नालों की सफाई के लिए यूं तो सामाजिक संगठन आगे आते रहते हैं, लेकिन सरकारी स्तर पर नदी नालों की उपेक्षा ही देखने को मिलती है। जिले में कई ऐसे नदी नाले हैं जो वर्षों से प्रदूषित हो रहे हैं लेकिन इन्हें प्रदूषण मुक्त करने के लिए कभी भी ठोस पहल नहीं हुई है।
जिले की प्रमुख नदियों में शामिल गौला, कलसा और शिप्रा भी प्रदूषण की मार झेल रहीं हैं। ओखलकांडा की ओर से आने वाली गौला भले ही अपने साथ प्रचुर मात्रा में खनिज भंडार लेकर आती हो, लेकिन रानीबाग में आते ही वह शवदाह के कारण प्रदूषित हो जाती है।
भवाली के पास श्यामखेत से निकलने वाला नाला कुछ किलोमीटर आगे जाकर शिप्रा नदी में तब्दील हो जाता है। यह इकलौती ऐसी नदी है जो उत्तर की ओर बहती है। श्यामखेत से लेकर भवाली, कैंची और गरमपानी तक शिप्रा जगह जगह प्रदूषित होती है। इसी नदी के किनारे भी शवदाह होता है।
यही नहीं अल्मोड़ा की ओर खैरना को बहने वाली कोसी नदी भी क्वारब से खैरना तक लगभग बीस किलोमीटर के दायरे में घरों, दुकानों और रेस्टोरेंट्स से निकलने वाली गंदगी से प्रदूषित होती है। हालांकि इन नदियों के पानी को लोग पेयजल के रूप में प्रयुक्त नहीं करते हैं, लेकिन जंगल में चरने वाले पशु पक्षी इसी से प्यास बुझाते हैं। जगह-जगह सिंचाई के लिए भी इन्हीं नदियों का पानी उपयोग में लाया जाता है। भवाली के मनोज नेगी जैसे युवा अपने दम पर इन नदियों में सफाई अभियान चलाते हैं, लेकिन सरकारी तौर पर इन नदियों का कोई सुधलेवा नहीं है।
धरती को ठंडा रखना और वायु प्रदूषण को रोकना बड़ी चुनौती : प्रो.तिवारी
नैनीताल। डीएसबी परिसर के वानिकी विशेषज्ञ प्रो. ललित तिवारी का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में मौजूदा समय में धरती को ठंडा रखना और वायु प्रदूषण को रोकना बड़ी चुनौती है।
उन्होंने बताया कि इस बार विश्व पर्यावरण दिवस के लिए संयुक्त राष्ट्र ने इकोसिस्टम रेस्टोरेशन थीम रखी है, जिसमें पेड़ लगाओ, हरे भरे शहर, बागों को पुन: हरा करना, नदी, नालों, तालाबों की सफाई आदि के कार्य शामिल है।
प्रो. तिवारी ने बताया कि वर्ष 2021 से 2030 तक इकोसिस्टम रेस्टोरेशन में 3.5 मिलियन भूमि के पारिस्थितिक तंत्र को पुन: स्थापित किया जाएगा। बताया कि पृथ्वी 32 फ़ीसदी लोहे, 30 फीसदी ऑक्सीजन, 15 फ़ीसदी मिलीकॉर्न, 14 फ़ीसदी मैगजीन तथा 8.8 फीसदी अन्य तत्वों से बनी है। विश्व का सबसे बड़ा तापीवर्षा जंगल अमेजॉन 20 फ़ीसदी ऑक्सीजन की अकेले आपूर्ति करता है। जैव विविधता वायु शुद्धता, जल शुद्धि, औषधि भोजन, ईधन प्रदान करते है। उनका कहना है कि वर्ष 2050 तक अगर 1.5 डिग्री तापमान में वृद्धि हुई तो परिणाम भयंकर होंगे। कहा प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले पौधे हल्दी, अदरक, गिलॉय, काली मिर्च, लांग, तेजपता को लगाना बेहद जरूरी है। यह विश्व के हर नागरिक की जिम्मेदारी होगी ताकि पृथ्वी सतत विकास ले सके।
पर्यावरण और जल संरक्षण में जुटा नौला फाउंडेशन
भीमताल (नैनीताल)। पर्वतीय क्षेत्रों में नौला फाउंडेशन तीन साल से पर्यावरण और जल संरक्षण पर लगातार काम कर रहा है। पर्यावरण संरक्षण के लिए फाउंडेशन की ओर से विभिन्न प्रजातियों के चौड़ी पत्तियों के पांच हजार से पौधे लगाए जा चुके हैं। साथ ही जल संरक्षण के लिए गांवों के जलस्रोतों, नौलों को पुनर्जीवित करने के साथ जंगलों में चालखाल और चेकडैम की मदद से जल संरक्षण में जुटे हुए हैं।
फाउंडेशन के संरक्षक किशन भट्ट ने बताया कि अल्मोड़ा जिले के थामड़ गांव, बासुली सेरा, द्वाराहाट के विजयपुर, बग्वाली पोखर में बींता गांव, पिथौरागढ़, कोटाबाग के विभिन्न गांवों और भीमताल ब्लॉक के घंटादेवी मंदिर परिसर में, सौनगांव, अलचौना, चाफी, पहाड़पानी आदि क्षेत्रों में जल संरक्षण के लिए पांच हजार से अधिक चौड़ी पत्ती के पौधे लगा चुके हैं। भीमताल ब्लॉक की ग्राम पंचायत सौनगांव में नौले का पुनर्निर्माण कर उसे संरक्षित किया है। साथ ही गांवों में चैकडैम और चालखाल बनाए हैं।
ओखलकांडा के चंदन जंगल बचाने में जुटे
ओखलकांडा ब्लॉक के नाई गांव के पर्यावरण प्रेमी चंदन नयाल चालखाल और चैकडैम बनाने के साथ पौधे रोपकर हरियाली बढ़ाने में लगे हैं। चंदन ने बताया कि वह युवाओं के साथ 200 से अधिक चालखाल और खंतिया तैयार कर चुके हैं, जिसमें 30 हजार लीटर जल संरक्षित किया जा सकता है। बताया कि वह जंगलों में चौड़ी पत्तियों के हजारों पौधे लगा चुके हैं। साथ ही चंदन पर्यावरण संरक्षण को लेकर लोगों को लगातार जागरूक कर रहे हैं।