गौला में अवैध खनन के लिए घोड़ा से लेकर डंपर तक सब झोंक दिया है। यही नहीं जैसे वन विभाग ने नदी क्षेत्र को खनन के लिये गेट में बांटा है, उसी तर्ज पर अवैध खनन करने वालों ने नदी के इलाके को बांट लिया है, जिससे विवाद की स्थिति न आये। इसमें सफेदपोशों का संरक्षण मिला हुआ है।
अगर रानीबाग की बात करें, तो यहां की भौगोलिक स्थिति के हिसाब से घोड़े, खच्चरों को ही नदी में उतारा जाता है। इसी तरह गौला बैराज, शीशमहल में भी खच्चरों के अलावा कुछ बुग्गी चलती हैं। गौला बैराज क्षेत्र और एनएचपीसी के नदी से सटे हुये इलाकों में इन खच्चरों से रेत आदि को एकत्र करने के लिये अवैध गोदाम बने हैं, जहां पर माल एकत्र किया जाता है। फिर डंपर से माल ठिकाने लगा दिया जाता है।
राजपुरा, इंद्रानगर में नदी से मुख्य मार्ग में आने के लिये चढ़ाई कम है, इस कारण यहां पर बुग्गियों की संख्या अधिक है। रात दो बजे से ही नदियों में अवैध खनन करने का काम शुरू हो जाता है। शांतिपुरी इलाके में नदी की स्थिति कुछ अलग है, वहां के हालात का देखते हुए अवैध खनन करने वालों ने भैंसा गाड़ी (डनलप) को माध्यम बनाया है। इनसे खूब खनिज निकाला जाता है। तस्कर सुविधा के हिसाब से नदी के इलाके को बांटने के साथ ‘आका’ भी तय कर लेते हैं। इन्हीं आका की सरपरस्ती में अवैध खनन किया जाता है।
चारा, गंदगी बनी मददगार
हल्द्वानी। डंपर आदि को पकड़ने के बाद वन विभाग को सरकारी संपत्ति घोषित करने का अधिकार है, लेकिन घोड़े, खच्चर, भैंसे को पकड़ने के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं है। अगर वन विभाग की टीम घोड़ा, खच्चर पकड़ती है, तो उनको रेंज कार्यालय तक लाने में पसीने छूट जाते हैं। कार्यालय में रखने पर इनके लिये चारा की व्यवस्था करनी होती है। इसके अलावा मलमूत्र से बदबू भी होती है। ऐसे में वन विभाग सिरदर्दी से बचने के लिये शायद ही कभी घोड़े, खच्चरों को पकड़ता हो।