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कुमाऊंनी होली की अपनी अदा ही निराली

Wed, 23 Mar 2016 10:07 PM IST
ब्यूरो/नैनीताल
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पौष मास के प्रथम रविवार से ही होली गायन का शुभारंभ करना देवभूमि कुमाऊं अंचल में ही प्रचलित है और यही कुमाऊंनी होली की अपनी सबसे बड़ी विशेषता भी है।वास्तव में कुमाऊंनी होली की अभिव्यक्ति के दो माध्यम हैं बैठकी होली व खड़ी होली। बैठकी होली में विशिष्ट जनों की तथा खड़ी होली में आम जनों की भागीदारी होती है। बैठकी होली में लोग हारमोनियम, तबला, सितार, मंजीरा तथा खटका भी साथ लेकर चलते हैं।
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पुरुष वर्ग के मध्य में बैठकी होली की महफिलें सजती हैं लेकिन इसकी जो बंदिशें हैं और उनका जो कलेवर का गठन है ये मैदान या डांठ से शुरू होकर कहरूवा की अधि द्रुत और उसमें लगी लड़ी उसके प्रकार और गायक उसको अलग-अलग भावों से अभिव्यक्ति देता है। 

होली गानों में तबले के ठेके तीन ताल, सितारखानी, कहरुवा के क्रम में बजाया जाता है। रागों को उनके समयानुसार ही गाया जाता है। शास्त्रीय आधार के रागों को गानों की पारंपरिक शैली की एक अलग बैठकी होली में यह होलियां गायी जाती हैं।
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धमार: वा के मन कुछ और आई, ऐरी मेरे मुख पर मारो गुलाल सांवरा। निपट निडर काहूं की न मानत, ऐसे निठुर नंद लाल।
जंगला काफी: सारी डार गयो मोये रंग की गागर, कैसा धोखा दिया मैं तो भूल से देखन लागी इधर।
भैरवी: तुम सीधे फेंको गुलाल लाल, मेरी आंख बचा के लाल, तुम तो गई थी पनिया भरन को, ले गयो लाल छिपा के लाल।
विहाग: लगन बिन को जागे सारी रात, या जागे जोगी या जागे भोगी, या जागे ललना की माता।
देश: मैं तो कोसूंगी कुंज बिहारी लाल को, मोरी नई रे चुनरिया फारी।
जंगला काफी: सारी डार गयो मोपे रंग की गागर, कैसा धोखा दिया मैं तो भूल से देखन लागी इधर।
 
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