तराई पश्चिम वन प्रभाग के 450 हेक्टेयर इलाके में कब्जा कराने वाले को जैसे-तैसे वन विभाग ने प्रशासन-पुलिस के सहयोग से हटा लिया, पर इस कब्जे को लेकर आंख बंद रखने वाले या कथित तौर पर मिलीभगत करने वाले किसी अफसर, कर्मचारी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। विभागीय सूत्रों के अनुसार अगर सही से निष्पक्ष जांच हो जाए, तो कई आला अफसर से लेकर कर्मचारियों की भी गर्दन नप सकती है।
आमपोखरा रेंज में इतना बड़ा कब्जा रातों-रात नहीं हुआ है, बल्कि यह लंबे समय से चल रहा था। इसमें वन विभाग की भूमिका भी संदिग्ध बनी हुई है। कब्जा कर जमीन बेचने के मामला चर्चा में है, पर वन विभाग ने कब्जेदारों को तो खदेड़ दिया, जबकि वन विभाग के कर्मचारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। हालांकि, इलाके की सुरक्षा, सुरागकशी के लिए वन रक्षक, वन दरोगा, डिप्टी रेंजर, रेंजर तक फील्ड स्टाफ की फौज होती है।
वन कर्मियों को निश्चित समय में सीमांकन पीलर और वन भूमि के संबंध में जानकारी देनी होती है, लेकिन वन कर्मी मामले को दबाए रहे। यह मामला तब खुला, जब माओवादियों की तलाश में पुलिस की टीम गश्त पर गई। ऐसे में वन कर्मियों और अफसरों की भूमिका संदिग्ध बनी हुई है। ऐसे में वनाधिकारी कार्रवाई करने की हिम्मत जुटा नहीं पा रहे हैं। डीएफओ राहुल के अनुसार इसमें वन कर्मियों की भूमिका संदिग्ध हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर चुप्पी साधे हैं।