मुख्यमंत्री हरीश रावत से लंबे समय तक से जुड़ाव और गैरसैंण को न भूलना आखिरकार अब महाधिवक्ता हो चुके विजय बहादुर सिंह नेगी के काम आया। अपनी पसंद को जाहिर करते हुये मुख्यमंत्री हरीश रावत ने लगे हाथों एक तीर से दो निशाने भी साध लिए।
वीबीएस नेगी के परिवार की एक खासियत भी रही है, जो उन्हें औरों से अलग भी करती है। पहली यह कि इस परिवार ने इलाहाबाद से लेकर नैनीताल तक से जुड़ाव के बाद भी गैरसैंण से अपने मोह को छोड़ा नहीं है। वीबीएस नेगी के पिता मेहरबान सिंह खुद भी महाधिवक्ता रहे हैं।
वकालत से उनका जुड़ाव वीबीएस नेगी तक भी पहुंचा। खास बात यह रही है कि गैरसैंण में आज भी इस परिवार को जमीन से जुड़ाव के लिए जाना जाता रहा है। ऐसे में नेगी को महाधिवक्ता के रूप में चुनकर मुख्यमंत्री हरीश रावत ने परोक्ष रूप से ही सही गैरसैंण को भी दिलासा देने की कोशिश की है। महाधिवक्ता की दौड़ में अपर महाधिवक्ता अवतार सिंह रावत और डीके शर्मा भी शामिल थे । माना जा रहा था कि प्रदेश सरकार के लिए इनमें से चुनाव आसान नहीं होगा।
सूत्रों की मानें तो वीबीएस नेगी के नाम पर मुहर लगने में सालों पुराने संबंध और धीरज को बनाये रखना भी काम आया। विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री रहते हुये भी नेगी का नाम महाधिवक्ता पद के लिए सामने आया था। उस समय भी हरीश रावत ने उनके नाम की पैरवी की थी। उस समय विजय बहुगुणा के खासे नजदीक सुबोध उनियाल अपने भाई यूके उनियाल की पैरवी कर रहे थे। वहीं, महाराज खेमा अवतार सिंह रावत के नाम की पैरवी कर रहा था।
आखिरकार बाजी सुबोध उनियाल के हाथ लगी। 18 मार्च, 2016 को सदन में कांग्रेस सरकार के खिलाफ विजय बहुगुणा और उनके साथ के नेताओं के विद्रोह ने समीकरण बदल दिये। महाराज पहले ही भाजपा का दामन थाम चुके थे। ऐसे में इस कठिन समय में भी अपने रुख को साफ रखना महाधिवक्ता पद की दौड़ में नेगी के काम आया।