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Nainital News: आधी आबादी की रामलीला मंचन में पूरी हिस्सेदारी

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हल्द्वानी। कुमाऊंनी रामलीला का विस्तृत इतिहास रहा है। गीत-संगीत और प्रस्तुतिकरण की दृष्टि से कुमाऊं की रामलीला कई मायनों में अनूठी मानी जाती है। यहां स्थानीय युवा वर्ग को अभिनय और गायन की प्रतिभा दिखाने का भी अवसर मिलता है। बदलते समाज के साथ रामलीला के प्रस्तुतिकरण में बदलाव भी देखे गए हैं। अधिकांश रामलीलाओं में अब महिला किरदार भी पूरी तन्मयता से मंचन में भागीदारी कर रहे हैं।
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रामलीला कमेटी रानीबाग के पूर्व सचिव दीपक नौगांई बताते हैं कि एक दौर था जब महिलाओं को रामलीला में भूमिका निभाने की इजाजत नहीं दी जाती थी। लेकिन आज अधिकांश जगह की रामलीलाओं में महिलाएं और युवतियां काफी उत्साह से अच्छे किरदार निभा रही हैं। हालांकि आधुनिकीकरण के बावजूद कुमाऊंनी रामलीला में कर्मकांडों की तरह रुढि़बद्धता नहीं है। सभी का मंतव्य लोगों को जोड़ना और अपनी संस्कृति तथा परंपराओं को समृद्ध करना है। वर्तमान में प्रस्तुतिकरण में मंच पर लाइट अब पात्र के आधार पर तय होती है। उदासी भाव, राक्षसी भाव, राजश्री या फिर उत्साह के भाव में लाइट्स का प्रयोग भी उसी तरह हो रहा है।
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अभिनय और गायन में रुचि रखने वालों के लिए अवसर
कुमाऊं में कलाकारों की कमी नहीं है लेकिन उन्हें मंच पर अवसर नहीं मिल पाता है। लेकिन रामलीला उन्हें यह अवसर देती है। रंगकर्मी हरीश पांडे बताते हैं कि स्थानीय कलाकार जो गायन में और कलाकारी में रुचि रखते हैं, उनके लिए रामलीला से अच्छा मंच नहीं है। यहां उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का भरपूर अवसर मिल जाता है। हालांकि इससे पहले युवाओं को प्रशिक्षण देकर जो खामियां रह जाती हैं, उन्हें दूर करने का प्रयास किया जाता है। बॉलीवुड में अभिनय का जौहर दिखा चुके स्व. निर्मल पांडे ने भी अभिनय का सफर रामलीला से ही शुरू किया था।
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