आचार संहिता लागू होने के साथ चुनावी शंखनाद हो गया। हल्द्वानी उत्तराखंड की सबसे हॉट विधानसभाओं में शामिल है। मुख्यमंत्री हरीश रावत की सरकार में वित्तमंत्री एवं आगामी चुनाव में मुख्यमंत्री की दौड़ में प्रबल दावेदार डॉ. इंदिरा हृदयेश हल्द्वानी की विधायक हैं।
ग्रेटर हल्द्वानी में अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम के अस्तित्व में आने, अंतरराष्ट्रीय स्तर के चिड़ियाघर और आईएसबीटी के शिलान्यास ने हल्द्वानी को नई पहचान दी है। जन सुविधाओं में अरबों रुपए खर्च हुए।
इन सबके बाद भी हल्द्वानी की जनता तमाम समस्याओं से भी जूझ रही है। गर्मियां तो दूर जाड़ों और बरसात में लोग पेयजल के लिए तरसते हैं। ओवर हैड टैंक बने हैं, लेकिन पानी नहीं चढ़ता है। नगर निगम और विधानसभा के आपसी झगड़े का खामियाजा जनता भुगत रही है।
निगम में भाजपा के मेयर तो विधायक कांग्रेस की हैं। यातायात व्यवस्था बदहाल है। नगर निगम क्षेत्र की तमाम समस्याओं की तरफ विधायक डॉ. हृदयेश ने भी आंखें बंद कर दी हैं। हालांकि, अब 2017 के चुनाव में डॉ. हृदयेश के साथ दूसरे प्रतिद्वंद्वी दावेदार भी इन्हीं समस्याओं को मुद्दा बनाकर जनता के बीच वोट मांगने आएंगे।
पांच साल में महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट एवं विकास कार्य
अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम का निर्माण एक अरब 93 करोड़ रुपए
अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर का निर्माण कार्य 90 करोड़ रुपए
अंतरराज्यीय बस अड्डा शिलान्यास 76 करोड़ रुपए
हल्द्वानी स्टेडियम का पुनर्निर्माण 14 करोड़ रुपए
राज्य योजना में सड़क निर्माण कार्य 1 अरब 44 करोड़ 32 लाख 74 हजार रुपए
जिला योजना में सड़क निर्माण कार्य एक अरब 45 करोड़ 95 लाख 20 हजार रुपए
ट्यूबवेल निर्माण, लाइन विस्तार और ओवर हैंड टैंक निर्माण 12 करोड़ 47 लाख 85 हजार रुपए
जलसंस्थान से पेयजल लाइनों का विस्तार कार्य एक करोड़ 44 लाख 17 हजार 800 रुपए
विधायक निधि से पेयजल लाइनों का विस्तार तीन करोड़ 51 लाख रुपए
बिजली विभाग से लाइन विस्तार, पोल और ट्रांसफार्मर निर्माण एक करोड़ 90 हजार रुपए
काठगोदाम से मंडी तक सड़क चौड़ीकरण और विद्युतीकरण कार्य 28 करोड़ रुपए
कुल : छह अरब 10 करोड़ 60 लाख 96 हजार 800 रुपए
इन मुद्दों के साथ एक बार फिर ‘मैदान’ में
हल्द्वानी का विकास सभी के सामने है। शहर महानगर बन चुका है। विकास के साथ समस्याएं भी उभरी हैं और समस्याओं का निदान करना सबका दायित्व है। विकास के मुद्दे पर जनता ने पहले भी जिताया और फिर विकास के मुद्दे पर जनता के बीच जाएंगे। मौजूदा दौर संचार क्रांति और तकनीकी का है। हल्द्वानी को फ्री वाई-फाई बनाना लक्ष्य है।
पार्किंग और यातायात बड़ी समस्या है। आईएसबीटी निर्माण के बाद हल्द्वानी का बस अड्डा खाली हो जाएगा। उस जगह पर मल्टी स्टोरी पार्किंग बनाई जाएगी। यातायात का दबाव कम करने के लिए रिंग रोड और कई जगहों पर फ्लाईओवर भविष्य की जरूरत है।
इसकी प्लानिंग की जाएगी। सीवरेज से शहर को जोड़ा जाना है। बरसात में जलभराव की समस्या से लोग परेशान रहते हैं। सैटेलाइट इमेज से ड्रेनेज सिस्टम को दुरुस्त किया जाएगा। सुशीला तिवारी अस्पताल और बेस अस्पताल में चिकित्सा सुविधाएं बढ़ाने की जरूरत है।
रानीबाग चित्रशिला घाट में विद्युत शव दाह गृह निर्माण कर पानी का ट्रीटमेंट वैज्ञानिक विधि से किया जाना जरूरी है। यही स्थानीय मुद्दे प्राथमिकता के साथ चुनावी एजेंडे में शामिल होंगे। 2017 में कांग्रेस सरकार की दोबारा वापसी होगी और जनता के आशीर्वाद से इन्हें पूरा कराऊंगी।
- डॉ. इंदिरा हृदयेश, वित्तमंत्री, उत्तराखंड।
स्वास्थ्य सेवाएं खुद बीमार हैं। मेडिकल कॉलेज खोल दिया है, लेकिन उसे देखने वाला कोई नहीं। 2010 में राजकीयकरण के बाद गजट नोटिफिकेशन नहीं हो सका है। यातायात बड़ी समस्या है। ड्रेनेज सिस्टम फेल होने से गर्मियों में कालाढूंगी चौराहा से मुखानी तक सड़क तालाब बन जाती है। जनता को इन्हीं मुद्दों को लेकर अपना जनप्रतिनिधि चुनना चाहिए।
- ओपी पांडे, राजनीतिक विचारक।
पेयजल शहर की सबसे बड़ी समस्या है। जिस समस्या का हल पिछले 60 साल से नहीं निकल पाया है। पानी की पूर्ति के लिए जगह-जगह ट्यूबवेल लगाए जा रहे हैं। लेकिन, कमीशनखोरी के लिए ट्यूबवेलों का निर्माण भूजल स्तर के लिए बड़ा खतरा है। आने वाले 20 सालों से भूजल खत्म हो जाएगा और ट्यूबवेल सिर्फ शोपीस बनकर रह जाएंगे। इसकी शुरुआत कई ट्यूबवेलों से होने लगी है।
- जगमोहन रौतेला, समाजसेवी।
नेतागीरी के लिहाज से हल्द्वानी वीआईपी शहर है। कई कैबिनेट मंत्री यहां रहते हैं। उच्च पदों से रिटायर्ड होने के बाद अफसर भी यहीं बस जाते हैं। इन सबके बाद भी हल्द्वानी की दुर्गति है। यातायात की समस्या से हर कोई त्रस्त है। पूरी हल्द्वानी अतिक्रमण से घिरी है। नेताओं और अफसरों में इच्छा शक्ति नहीं होने से समस्याएं कोढ़ में खाज बन चुकी हैं। सुधार नहीं हुआ तो भविष्य में पैदल चलना भी दूभर हो जाएगा।
- करिश्मा बर्गली, छात्रा।
हल्द्वानी एवं काठगोदाम में कई मलिन बस्तियां हैं। वहां भी इंसान रहते हैं। सबसे बड़ी बात सर्वाधिक वोट प्रतिशत इन्हीं बस्तियों का होता है, लेकिन वे लाग नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। सिर्फ वोट के लिए ही इन लोगों का इस्तेमाल होता है। दमुवाढूंगा, बनभूलपुरा और गफूर बस्ती ज्वलंत मुद्दे हैं। कहीं लोग मालिकाना हक की लड़ाई लड़ रहे हैं तो कहीं छत उजड़ने के खौफ में जी रहे हैं। पुनर्वास और जन सुविधाएं जरूरी हैं और उनका हक है।
- अशोक विशेन, शीशमहल।