2017 के चुनाव के नजदीक आते ही भाजपा में आपसी खींचतान शुरू हो गई है। एक दावेदारी सामने क्या आई कि भाजपा में जोड़ तोड़ से लेकर विरोध समर्थन तक की सियासत ने पांव पसार लिये हैं। कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाली इसी हल्द्वानी सीट पर 2012 में भी भाजपा ने इसी खींचतान का खामियाजा भुगता था।
मेयर डा. जोगेंद्र रौतेला ने कुछ समय पहले ही हल्द्वानी सीट पर अपनी दावेदारी ठोकी थी। मेयर यह दावेदारी भर भाजपा में अंदरूनी खींचतान का सबब बन गई है। संभावित प्रत्याशी ही नहीं बल्कि भाजपा के एक खेमे ने मेयर से दूरियां बढ़ा ली हैं। नगर निगम की दुकानों का किराया बढ़ाने के मामले में अब यह खुलकर सामने आ रहा है। विरोध करने वालों में अधिकांश भाजपा से जुड़े व्यापारी एवं लोग ही शामिल हैं।
भाजपा के कई और नेता भी चुनाव लड़ने का मंसूबा पाले हैं और तमाम समीकरण को टटोल रहे हैं। पिछले दिनों केंद्रीय राज्य मंत्री अजय टम्टा के हल्द्वानी आने पर शहर में लगे भाजपा जिला और नगर कार्यकारिणी के होर्डिंग में मेयर की फोटो ही गायब थी। मेयर समर्थक यह भी कह रहे हैं कि भाजपा से जुड़े कई समारोहों में भी मेयर को नजरअंदाज किया जाने लगा है।
भाजपा से इस समय रेनू अधिकारी भी प्रबल दावेदार हैं और तैयारी में जुटी हैं।
2012 के चुनाव में रेनू अधिकारी भाजपा से मैदान में उतरी। रेनू अधिकारी कांग्रेसी पृष्ठभूमि से थी और कांग्रेसी रहते हुए तत्कालीन नगर पालिका हल्द्वानी की चेयरमैन निर्वाचित हुई थी। तब कांग्रेस पार्टी में उनका कद मौजूदा वित्तमंत्री डॉ. इंदिरा हृदयेश के बाद दूसरे नंबर पर था। बाद में रेनू अधिकारी अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गई। भाजपा से उन्हें टिकट भी मिल गया, लेकिन भाजपा फतह हासिल नहीं कर पाई। हार की सबसे बड़ी वजह भाजपा में धड़ेबाजी रही।
खुद चुनाव लड़ने का सपना देखने वाले भाजपाई रेनू अधिकारी को बतौर प्रत्याशी स्वीकार नहीं कर पाए। हल्द्वानी कांग्रेस का दुर्ग है। भाजपा के लिए इसे भेदना काफी मुश्किल है। 2012 के विधानसभा चुनाव नये परिसीमन पर हुये । हल्द्वानी विधानसभा में नए परिसीमन का असर नहीं पड़ा। हल्द्वानी में मुसलिम मतदाता निर्णायक की भूमिका में है। भाजपा मुसलिम मतदाताओं के बीच घुसपैठ नहीं बना पाई। ऐसे में 2017 में चुनाव से ठीक पहले की यह खींचतान भाजपा को खासा नुकसान भी पहुंचा सकती है।