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आ गए सैकड़ों किमी दूर से मेहमान चरवाहे

Tue, 03 Feb 2015 02:03 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, हल्द्वानी
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हिमालयी क्षेत्रों से सैकड़ों किलोमीटर पैदल दूरी तय कर चरवाहे भेड़ एवं बकरियों के साथ नैनीताल जिले के अमृतपुर, फतेहपुर, हैड़ाखान, कोटाबाग, चोरगलिया और रामनगर के जंगलों तक आ पहुंचे हैं। चरवाहों के साथ 503 भेड़ एवं बकरियों के अलावा कुत्ते हैं।
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सात कुत्ते जंगली जानवरों से भेड़ एवं बकरियों की पहरेदारी करते हैं। हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी होने से पलायन कर यहां तक पहुंचे चरवाहे होली के बाद अपने-अपने इलाकों में लौटने शुरू होंगे। चरवाहों के आने से पशु चिकित्सकों के दल ने भेड़ एवं बकरियों के टीकाकरण एवं दवापान के लिए जंगलों तक पहुंच रहे हैं।

उत्तराखंड के उत्तरकाशी, चमोली, धारचूला और मुनस्यारी के उच्च हिमालयी क्षेत्रों नवंबर आखिर से बर्फबारी शुरू हो जाती है। इन इलाकों में अधिकतर लोगों की आजीविका भेड़ और बकरी पालन पर निर्भर है। हिमपात होने के साथ चरवाहों की खानाबदोश जिंदगी शुरू हो जाती है।
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चरवाहे भेड़ एवं बकरियों के चारे की तलाश में पलायन शुरू कर देते हैं। पलायन करीब छह माह तक रहता है। चरवाहे भेड़ एवं बकरियों को चराते हुए सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करते हैं। हफ्तों तक एक ही जगह टेंट लगाकर रहते हैं। आसपास क्षेत्र में चारा खत्म होने के बाद इनका अगला पड़ाव शुरू हो जाता है।

मुनस्यारी, चमोली और उत्तरकाशी के तीन चरवाहे नैनीताल जिले के अमृतपुर, चोरगलिया, फतेहपुर, कोटाबाग और रामनगर के जंगलों तक आ पहुंचे हैं। इनके साथ 203 भेड़ और बकरियां हैं। चरवाहों ने पानी वाली जगहों पर अपने ठिकाने बनाए हैं।

पशु चिकित्सक डीएस मर्तोलिया के मुताबिक विभाग ने जंगलों में पहुंचकर भेड़ एवं बकरियों का टीकाकरण एवं दवापान करा दिया है। डा. मर्तोलिया के मुताबिक चरवाहे जंगल में रोजाना आठ किलोमीटर तक भेड़ एवं बकरियों के साथ जाते हैं। फिर वापस अपने टेंट तक आ जाते हैं।

कुत्ते रतजगा कर सुरक्षा करते हैं
अमृतपुर के जंगल में चरवाहों की दो बकरियों पर पिछले दिनों तेंदुए ने हमला किया। हमले में घायल बकरियों का पशु चिकित्सकों ने इलाज किया। भेड़ एवं बकरियां रात में समूह बनाकर सोती हैं। जबकि सातों कुत्ते रतजगा कर जंगली जानवरों से उनकी सुरक्षा करते हैं।

दिहाड़ी पर आते हैं चरवाहे
नैनीताल जिले के जंगलों तक पहुंचे चरवाहे दिहाड़ी मजदूरी पर हैं। भेड़ एवं बकरियां हल्द्वानी निवासी कमल राणा की हैं। कमल राणा और चरवाहों का संबंध पिछले कई पीढ़ियों से है। चरवाहे बताते हैं पहले उनके बाप दादा कमल राणा के बाप दादा के भेड़ एवं बकरियां चराते थे। तब एक सीजन में एक चरवाहे को सात भेड़ भेंट की जाती थी, लेकिन अब दिहाड़ी दी जाती है।

चरवाहों के साथ भेड़ एवं बकरियों का बीमा
पशुपालन विभाग चरवाहों के साथ भेड़ एवं बकरियों का बीमा कराता है। जंगलों में चुगान कराने के लिए वन विभाग से एनओसी लेनी अनिवार्य है। जंगल में चिह्नित एरिया में ही चुगान होता है।
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