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लोक कला व संगीत को संरक्षित करना नैतिक जिम्मेदारी

Thu, 05 Nov 2015 12:41 AM IST
ब्यूरो /अमर उजाला, नैनीताल।
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 यूजीसी मानव संसाधन विकास केंद्र कुमाऊं विश्वविद्यालय में बुधवार को संगीत अभिमूल्यन विषय पर हुई कार्यशाला में विषय विशेषज्ञों ने लोक कलाओं, लोक गीत संगीत व लोक संस्कृति को संरक्षित किए जाने की वकालत की। कहा कि यदि हम ऐसा करने में असफल हुए को हमारी सभ्यता, संस्कृति का मूल समाप्त हो जाएगा।
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जिसके लिए भावी पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी। हर्मिटेज भवन में आयोजित कार्यशाला में मुख्य अतिथि पद्मश्री यशोधर मठपाल ने कहा कि संस्कृति संरक्षण के लिए लोक कलाकारों के लिए बेहतर माहौल तैयार करना तथा उन्हें आर्थिक रूप से समृद्ध बनाना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

 इससे लोक संस्कृति संरक्षण की शुरुआत की जा सकेगी। कुविवि के कुलपति प्रो. एचएस धामी ने कहा कि लोकगीत, संगीत, लोक कला व संस्कृति को संरक्षित रखना सभी को नैतिक जिम्मेदारी समझनी चाहिए। उन्होंने कहा कि लोक कलाओं व संगीत को विवि के माध्यम से संरक्षित करने के साथ ही इसके प्रचार व प्रसार के प्रयास किए जाएंगे।
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विशंभर नाथ साह सखा ने कहा कि लोक कला के संरक्षण व प्रचार के लिए की जिम्मेदारी अधिकारी व अफसरों के हाथों में न होकर लोक कला से जुड़े समर्पित लोगों के हाथों में होनी चाहिए। इसमें शालिनी साह, प्रभात साह गंगोला, डा. विजय कृष्ण आदि ने विचार रखे।

इस मौके पर निदेशक प्रो. बीएल साह, राजेश साह, दिनेश डंडरियाल, रेखा साह, रवि जोशी, प्रमोद पांडे, रीना सिंह, प्रो. हीरा सिंह भाकुनी, एसके पांडे आदि थे। संचालन डा. रितेश साह ने किया।
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