केंद्रीय शीतोष्ण बागवानी संस्थान के परिसर प्रभारी डा. बीएल अत्री और प्रधान वैज्ञानिक डा. राज नारायण ने कहा कि मुक्तेश्वर और इसके आसपास की जलवायु पुष्प उत्पादन के लिहाज से मुफीद है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि काश्तकार फल सब्जी उत्पादन के साथ-साथ पुष्प उत्पादन पर भी ध्यान दें तो काश्तकार आर्थिक रूप से समृद्ध हो सकते हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि केंद्रीय शीतोष्ण बागवानी संस्थान वर्तमान में लिलियम, कार्नेशन, ग्लाईडोलस, जरबेरा, आलस्टोमारिया, गेंदा, गुलाब, जिरेनियम, गुलदावरी जैसे पुष्पों की पैदावार के साथ-साथ उन पर अनुसंधान कर रहा है।
लिलियम जैसे महंगे फूलों का उत्पादन कम लागत पर सस्ते पालीहाउस में कर अच्छा मुनाफा दे सकते हैं। लिलियम की एक स्पाइक दिल्ली मे तकरीबन 40-50 रुपये में बिकती है।
एक हेक्टेयर में इसका उत्पादन कर लाखों रुपये कमाए जा सकते हैं। लिलियम की तकरीबन 3 -4 प्रजाति हैं, लेकिन खुशबू वाले लिलियम की खासी मांग है। उन्होंने बताया कि जरबेरा आफसेट विधि से लगाया जाता है।
मतलब एक पौधे से अन्य पौधे तैयार होते हैं। इन्हें मार्च और अप्रैल में लगाया जाता है। डा. अत्री बताते हैं कि काश्तकार एक ही खेत में पुष्प और सब्जी साथ-साथ लगा सकते हैं।
इसे लगाने के लिए उस खेत का चयन करना चाहिए, जहां पथरीली मिट्टी न हो। गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिए। लेटीबूंगा निवासी हिम्मत सिंह नयाल भी फूलों की खेती कर रहे हैं।