हल्द्वानी। घरेलू हिंसा की शिकार महिला दर्द से कराहते हुए सुशीला तिवारी अस्पताल की इमरजेंसी पहुंची। उसने दर्द बताया तो इलाज की जगह उसके सामने एफिडेविट लाने की इमरजेंसी खड़ी हो गई। उसे इस बात की कसम खानी थी कि शरीर पर लगे चोट के निशान पुराने हैं, नए नहीं। ऐसे में चोट पर मरहम से ज्यादा जरूरी उसके लिए शपथ पत्र था, क्योंकि इसके बगैर दर्द का इलाज संभव नहीं था। मजबूरन दर्द से कराहते हुए वह एफिडेविट बनवाकर लाई, तब उसे इमरजेंसी में इलाज मिल सका।
मंगलवार दोपहर बाद अपने भाई और परिजनों के साथ एसटीएच की इमरजेंसी में एक महिला पहुंची। वहां तैनात मेडिकल ऑफिसर को बताया कि घरेलू हिंसा के कारण उसके शरीर पर काफी चोटें हैं। दर्द से महिला का बुरा हाल था और उसकी हालत घरवालों से भी देखी नहीं जा रही थी। वह उम्मीद में थे कि घाव पर डॉक्टर मरहम लगाएं तो कुछ आराम मिले। मगर यहां मामला पेचीदा बता दिया गया, ऐसा कि मरहम की जगह उसे अब फिर दर्द झेलना था। डॉक्टर ने महिला से कहा कि चोट तीन दिन पुरानी है, आप पहले चोट से संबंधित एफिडेविट बनवाकर लाएं। परेशान परिजन महिला को लेकर एफिडेविट बनवाने चले गए। शाम को परिजन एफिडेविट के साथ महिला को लेकर दोबारा इमरजेंसी पहुंचे। हालांकि इस दौरान वहां डयूटी में मौजूद दूसरे मेडिकल ऑफिसर ने पीड़ित महिला का इलाज कराया। बताया गया कि महिला के कई जगह गुम चोट है। सिर पर भी चोट है। पूरे दिन शपथ पत्र बनाने के चलते परेशान होने के बाद आखिरकार शाम को उसे कुछ राहत मिली।
वर्जन
एफिडेविट मंगाना गलत है, अस्पताल में जो भी मरीज पहुंचता है, पहले उसका इलाज किया जाता है। संबंधित मेडिकल ऑफिसर से जानकारी ली गई तो पता चला कि पुरानी चोट के चलते एफिडेविट बनवाया गया। कई बार लोग गलत मेडिकल बनवा लेते हैं। एमएस से घटना के बारे में पूरी जानकारी लेंगे और जिम्मेदार डॉक्टर से पड़ताल की जाएगी।
डॉ. अरुण जोशी, प्राचार्य राजकीय मेडिकल कॉलेज, हल्द्वानी