हल्द्वानी। कुमाऊं में हरेले से एक दिन पूर्व सायंकाल पूजा घर में हर काली (डिकर) पूजन किया जाता है। हरेला पर्व पर हरित तृणों में स्थापित हर काली की प्रतिमाओं (जिन्हें स्थानीय भाषा में डिकर कहा जाता है) की श्रद्धा, आस्था और विश्वास के साथ पूजा अर्चना की जाती है।
शास्त्रों में कहा गया है कि जो इस प्रकार से शिव-शक्ति का पूजन करता है, वह चिर काल तक सुख और आनंद प्राप्त करता है। शिव प्रतिमाओं (डिकर) का हरेले के दिन या उससे पहले दिन इस मंत्र से पूजन का विधान है। ‘हर नाम समुत्पन्ने हरकालि हर प्रिये, सर्वदा सस्यमूर्तिस्ये प्रणतार्ति हरे नम:।’
कुमाऊं के सभी गांवों में शुद्ध स्थान की मिट्टी या आटे से शिव, पार्वती, गणेश, नंदी बैल, मूषक वाहन आदि की प्रतिमाएं बनाकर जिस जगह पर हरेला बोया जाता है। हरेला काटने से एक दिन पूर्व उसी स्थल पर इनकी पूजा-अर्चना की जाती है। माना जाता है जब भगवान विष्णु हर शयनी एकादशी पर चार माह की निद्रा में चले गए तब यह सभी शक्तियां मनुष्य की हर तरह से रक्षा करती हैं। चंद राजाओं के काल में इसका विशेष महत्व था। ज्योतिषाचार्य डा. नवीन चंद्र जोशी के मुताबिक सावन के अधिष्ठाता देव भगवान शिव हैं, जो प्रचंड वेग रूपी जल धाराओं से प्रकृति और जीवों को बचाने में समर्थ हैं। इस दिन शिव पूजा का आरंभ भी होता है।
डिकर (हर काली) और हरेला पूजन का शुभ मुहूर्त
डिकर पूजन: 15 जुलाई सायं 6.30 बजे से 7.30 बजे तक
हरेला पूजन: 16 जुलाई प्रात: 7.30 बजे से