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उत्तराखंड में केंद्रीय नेतृत्व के इशारे पर चुने गए विधानमंडल दल के नेता का विरोध नई बात नहीं

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बागेश्वर। उत्तराखंड में केंद्रीय नेतृत्व के इशारे पर चुने गए विधानमंडल दल के नेता का विरोध कोई नई बात नहीं है। वर्ष 2002 में राज्य की पहली निर्वाचित सरकार से ही मुख्यमंत्री का चयन विरोध का कारण बना है।
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हालांकि विरोध के स्वर कभी भी भाजपा ने अपने ऊपर हावी नहीं होने दिए। कांग्रेस ने भी नाराजगी को दरकिनार किया, लेकिन उन्हें इसका नुकसान 2017 के विधानसभा चुनाव से ऐन पहले बगावत के रूप में उठाना पड़ा और नौ विधायक पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए।
फ्लैशबैक में जाएं तो वर्ष 2000 में अपेक्षा के विपरीत भाजपा हाईकमान की इच्छानुसार नित्यानंद स्वामी विधानमंडल दल के नेता चुने गए और मुख्यमंत्री बने। मैदानी क्षेत्र से मुख्यमंत्री होने की वजह से विरोध के स्वर थे लेकिन वह काफी धीमे थे। साल बीतते-बीतते विरोध के मध्यम स्वर तेज हुए, नतीजतन वर्ष 2001 में भगत सिंह कोश्यारी मुख्यमंत्री बनाए गए।
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पार्टी उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव में गई लेकिन प्रदेश के पहले विधानसभा चुनाव में ही उन्हें कांग्रेस से शिकस्त मिली। कांग्रेस को बहुमत तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हरीश रावत के नेतृत्व में मिला लेकिन हाईकमान ने उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपने के बजाय खांटी राजनीतिज्ञ एनडी तिवारी को मुख्यमंत्री बना दिया।
तब रावत समर्थकों ने हंगामा किया लेकिन एनडी तिवारी और हाईकमान के आगे विरोध के स्वर धीमे पड़ गए। यही वजह रही कि एनडी तिवारी पूरे पांच साल निर्बाध रूप से सरकार चला गए।
वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में भाजपा जीती तो लगा कि कोश्यारी मुख्यमंत्री बनेंगे लेकिन भाजपा हाईकमान ने मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी पर दांव खेला। उस समय कोश्यारी समर्थकों ने शपथ ग्रहण स्थल पर जमकर हंगामा किया लेकिन हाईकमान ने विरोध को तवज्जो नहीं दी।
इसके बाद निशंक और फिर भुवन चंद्र खंडूरी मुख्यमंत्री बने, लेकिन विरोध के स्वर अंदरखाने तक ही सीमित रहे। वर्ष 2012 के चुनाव में सत्ता की चाबी कांग्रेस के पास आई तो हरीश रावत के बजाय कांग्रेस हाईकमान ने फिर अपनी चलाई और अधिसंख्य विधायकों की राय दरकिनार करते हुए विजय बहुगुणा को विधानमंडल दल का नेता चुनने का फरमान सुना दिया।
रावत खेमे ने विरोध किया लेकिन हाईकमान ने विरोध को तवज्जो नहीं दी। वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद घोटाला और अन्य कई वजहों से विजय बहुगुणा सरकार पर अंगुली उठी तो हरीश खेमा फिर सक्रिय हो गया और विरोध के स्वर भी तेज हो गए। हाईकमान के सामने रावत खेमे की चली।
फरवरी 2014 में बहुगुणा को सीएम की कुर्सी गंवानी पड़ी और हरीश रावत मुख्यमंत्री बने लेकिन हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनने से सतपाल महाराज, डॉ. हरक सिंह समेत कई क्षत्रप नाराज हो गए। इसी नाराजगी में सतपाल महाराज ने कांग्रेस भी छोड़ दी।
रावत अपनी सरकार चलाते रहे लेकिन पार्टी के भीतर जारी असंतोष को भांप नहीं पाए। चुनाव से ऐन पहले विजय बहुगुणा के नेतृत्व में कांग्रेस में बगावत हो गई और नौ विधायकों ने पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया।
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा मोदी के नाम पर प्रचंड बहुमत से जीती तो सीएम पद के दावेदारों में प्रकाश पंत का नाम भी सबसे आगे था लेकिन हाईकमान ने सत्ता त्रिवेंद्र सिंह रावत को सौंप दी। विरोध के स्वर उभरे लेकिन भाजपा हाईकमान के आगे किसी की नहीं चली।
मार्च 2021 में त्रिवेंद्र की कार्यशैली को लेकर बगावत की आवाज फिर बुलंद हुई तो भाजपा हाईकमान ने तीरथ को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी। अब शनिवार को तीरथ को हटाकर खटीमा के विधायक पुष्कर सिंह धामी को विधानमंडल का नेता चुना गया।
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विरोध के स्वर एक बार फिर गूंजे। एक बार फिर मान-मनौव्वल का दौर चला। आखिरकार विरोध के स्वर थमे और तीरथ सरकार के सभी मंत्रियों ने शपथ ग्रहण की।
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