उत्तराखंड समेत देश-विदेश में अपने सुरों का जादू बिखेरने वाले कई उत्तराखंड के लोक गायक सरकार की बेरुखी का दंश झेल रहे हैं। वेतन मिलना तो दूर सम्मान तक नहीं मिलने से गायकों के सुर बिगड़ते जा रहे हैं। मजे की बात तो यह है जब भी उत्तराखंड के गायकों को रंगमंच पर नेताओं के सम्मुख गाने का मौका मिला तब केवल गीत की तारीफ हुई। लेकिन सम्मान, वेतन, पेंशन मुहैया कराने जैसी बातें कहीं भी नहीं होतीं।
अल्मोड़ा जिले के मानिला के डडोली ग्राम निवासी प्रसिद्ध लोक गायक हीरा सिंह राणा ने बताया 1960 से अब तक वे 150 गीत लिखकर रंगमंच पर पेश कर चुके हैं, लेकिन सरकार से आज तक कोई मदद नहीं मिली। निजी कार्यक्रमों में गाने के बाद जो पूंजी मिलती है उसी पर संतोष करना पड़ता है। हीरा सिंह राणा उत्तराखंड के साथ ही मुंबई, गुजरात, दिल्ली, कानपुर, मध्यप्रदेेश जैसे कई बड़े शहरों में अपने सुरों की अद्भुत प्रस्तुति दे चुके हैं।
हाल ही में बनी ‘छुमक्याली एलबम’ में आई पिथौरागढ़ जिले की खुशी जोशी तो मां जगदंबा को ही अपना गुरु मानती हैं। कहती हैं उन्हीं की देन है कि उन्हें रंगमंच पर गाने का मौका मिला है। इसीलिए उन्हें जागरण में अधिक रुचि है। वहीं अन्य जगहों में बुलावे पर वह प्रस्तुति देती हैं। इन्हें भी सरकार की तरफ से आज तक कोई सम्मान नही मिला।
वहीं पिथौरागढ़ ग्राम थल निवासी लोक गायक पप्पू कार्की को भी सरकार से कोई मदद नहीं मिली। लेकिन निजी संस्थाओं द्वारा उन्हें अभी तक चार अवार्ड मिल चुके हैं। जिसमें वर्ष 2006 में उत्तराखंड आइंड्स, 2009 में सर्वश्रेष्ठ नवोदित लोक गायक, 2014 में बेस्ट सिंगर युवा, हाल ही में 29 नवंबर को उन्हें गोपाल बाबू गोस्वामी पुरस्कार मिला। लेकिन सरकार से सम्मान का अभी उन्हें भी इंतजार है।