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Nainital News: सिर्फ मौत ही मुआवजे का पैमाना, लापरवाही की जिम्मेदारी तय नहीं

Wed, 16 Sep 2026 01:50 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
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नैनीताल। ज्योलीकोट क्षेत्र में बीमारी के प्रकोप के बीच सरकारी व्यवस्था की कथित लापरवाही का खामियाजा अब सिर्फ जान गंवाने वाले परिवार ही नहीं, बल्कि इलाज करा रहे सैकड़ों परिवार भी भुगत रहे हैं। क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों की ओर से ढाई माह के दौरान करीब 300 लोगों के अस्पताल पहुंचने का दावा किया जा रहा है। कई परिवारों को इलाज, जांच, दवा और अस्पताल तक आने-जाने में लाखों रुपये खर्च करने पड़े हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों ने इसके लिए कर्ज तक लिया है। जनप्रतिनिधियों ने मृतकों के परिवारों के साथ ही विभागीय लापरवाही का खामियाजा भुगतने वाले प्रभावितों को भी मुआवजा देने की मांग उठाई है।
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आर्थिक स्थिति हुई प्रभावित
तल्ला बेलुवाखान निवासी करन कुमार आर्य के सात वर्षीय भतीजे रुद्राक्ष आर्य की तबीयत बिगड़ने पर 27 अगस्त को हल्द्वानी के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। दो दिन बाद हालत गंभीर होने पर उसे बरेली के प्राइवेट हॉस्पिटल ले जाया गया। छह सितंबर तक चले उपचार में परिजनों के अनुसार करीब दो लाख रुपये खर्च हुए। रुद्राक्ष की चार वर्षीय बहन लक्षिता भी पीलिया से पीड़ित है। दोनों बच्चों के इलाज ने परिवार की आर्थिक स्थिति को बुरी तरह प्रभावित किया है।
रकम के अभाव में भर्ती नहीं करने का आरोप
मृतक रीतेश जीना के पिता उमेश जीना ने निजी अस्पतालों की व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि बेटे को हल्द्वानी के रामपुर रोड स्थित निजी अस्पताल ले जाने पर 80 हजार रुपये जमा करवाए गए। बाद में उसे दिल्ली रेफर किया गया। उमेश के अनुसार वहां लीवर ट्रांसप्लांट के लिए 40 लाख रुपये और करीब 3.5 लाख रुपये प्रतिदिन आईसीयू खर्च बताया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि पर्याप्त धन नहीं होने पर बेटे को भर्ती नहीं किया गया।
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आयुष्मान कार्ड लगा लेकिन जांच आदि में लाख रुपये से अधिक खर्च
गेठिया निवासी भरत नेगी (19) का स्वास्थ्य तीन सितंबर को एकाएक बिगड़ गया। परिजन उन्हें तत्काल हल्द्वानी के एक निजी अस्पताल ले गए। यहां लिवर संबंधी समस्या बताते हुए उन्हें हायर सेंटर जाने की सलाह दी गई। परिवार कर्ज लेकर तुरंत उन्हें दिल्ली ले गया। वहां वसंत कुंज स्थित आईएलबीएस अस्पताल में उनका उपचार किया गया। चार दिन उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया। इस दौरान चिकित्सकों ने एक्यूट लिवर डैमेज होने की बात कहते हुए प्रत्यारोपण की बात कही तो डोनर की जांच में काफी खर्च जा गया। हालांकि बाद में हालात में सुधार होने पर प्रत्यारोण की नौबत नहीं आई। इस दौरान आयुष्मान कार्ड के अप्रूवल में भी दिक्कतें आईं जिसपर बुआ के बेटे विशाल ने काफी जद्दोजहद के बाद अप्रूवल दिलवाई। हॉस्पिटल के इलाज का खर्च तो आयुष्मान कार्ड से हो गया लेकिन इसके अतिरिक्त जांच सहित अन्य चीजों में परिवार के एक लाख रुपये खर्च हो गए। यह रकम परिवार को उधार लेकर जुटानी पड़ी।
प्रधान नवल कुमार के अनुसार ढाई माह में करीब 300 लोग अस्पतालों में भर्ती हुए हैं। उनका दावा है कि औसतन एक परिवार पर करीब एक लाख रुपये तक का कर्ज हो गया है। अधिकांश परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं। ऐसे में बीमारी से प्रभावित परिवारों को सिर्फ इसलिए मदद से बाहर नहीं किया जा सकता क्योंकि उनके घर में मौत नहीं हुई।
उप प्रधान मनोज बर्गली ने कहा कि सांसद ने मृतकों के परिवारों को आर्थिक सहायता का भरोसा दिलाया है, लेकिन अस्पतालों में भर्ती रहे और इलाज पर बड़ी रकम खर्च करने वाले परिवारों को भी मदद मिलनी चाहिए। पानी की गुणवत्ता से लेकर बीमारी फैलने की वजह और विभागीय कार्रवाई तक की जांच कर जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई हो।
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