रेलवे की भूमि से अतिक्रमण हटाने के मामले में कोर्ट, वोट और पुनर्वास के त्रिकोण में प्रशासन फंस गया है। करीब दो हजार परिवारों के साथ मानवीय पहलू (पुनर्वास) के अलावा चुनाव में वोट की अहमियत भी है, ऐसे में कोई भी कदम ‘आकाओं’ का खेल बिगाड़ सकता है। पर फिलहाल कब्जेदारों के पुनर्वास के लिये कोई भी जमीन प्रशासन तलाश नहीं कर सका है।
2007 में रेलवे ने अतिक्रमित भूमि का सर्वे किया था। इसमें गफूर-ढोलक बस्ती के अलावा राजपुरा, इंद्रानगर ठोकर तक के परिवारों को शामिल किया था। एक अनुमान के मुताबिक इन जगहों पर मौजूदा समय में करीब दो हजार परिवार रह रहे हैं। इसमें 1400 तक परिवार की बात प्रशासन और रेलवे की संयुक्त मीटिंग में केवल गफूर-ढोलक बस्ती में रहने की बात सामने आयी थी।
कोर्ट में जमीन पर कब्जे का मामला चल रहा है। ऐसे में प्रशासन और रेलवे जमीन को खाली कराने की तैयारी कर रहा है। इसके बीच प्रशासन बसे हुए लोगों को मानवीय दृष्टि और सभी को घर देने की योजना के अनुसार पुनर्वास की बात भी कर रहा है, लेकिन मौजूदा समय में इतनी बड़ी संख्या में लोगों को कहां पर बसाया जाए? इसका जवाब नहीं है।
अभी तक राजपुरा में सरसरी तौर पर केवल जैम फैक्ट्री का ही विकल्प सामने आया है। अधिकारी भी मानते हैं कि अगर कोई जमीन मिल भी जाए और मल्टी स्टोरेज बिल्डिंग को गति के साथ बनाया जाए, तो करीब दो साल तक का समय लग सकता है। ऐसे में कब्जेदार परिवारों के लिए तात्कालिक कोई भी पुनर्वास की जगह और व्यवस्था दोनों नहीं है।
इसके अलावा सबसे अहम इन परिवारों का आगामी चुनाव में वोट भी है। एक परिवार में अगर औसतन 4 व्यक्ति वोटर माना जाए, तो आठ हजार वोटर और कम से कम उतने ही परिवार से जुड़े लोग और समर्थक हैं। राजनैतिक तौर गफूर-ढोलक बस्ती के लोग जागरूक और वोट की अहमियत को पहचान करने वाले भी माने जाते हैं, ऐसे में प्रशासन के सामने इनको ‘नाराज’ न करने की भी चुनौती है।
डीएम दीपक रावत का कहना है कि 40 साल से लोग रह रहे हैं, इनका पुनर्वास किये बगैर हटाया जाना संभव नहीं है। इस वक्त बरसात है, मानवीय दृष्टि से भी कदम ठीक नहीं होगा। इसके अलावा कानून व्यवस्था का भी मसला है। अगर आवश्यकता हुई तो कोर्ट के सामने व्यवहारिक दिक्कतों को रखा जाएगा।