साक्ष्यों से स्पष्ट है कि विधायकों पर कार्रवाई जानकारी उन्हें ईमेल से दी गई, उनके आवास पर चस्पा की गई और उनकी विधानसभा के पते पर भी दी गई। न्याय के दो सिद्धांत है, एक वह कि जल्दबाजी में दिया गया न्याय न्याय नहीं हो सकता। दूसरा यह कि देर से किया गया न्याय न्याय नहीं है। अत: न्याय करने वालों को इन दोनों के बीच संतुलन रखना आवश्यक है। इस मामले में ऐसा नहीं लगता कि स्पीकर ने अनावश्यक जल्दबाजी की, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन हुआ हो। सुप्रीम कोर्ट ऐसे मामलों में अनावश्यक देरी किए बगैर निर्णय लेने को कह चुका है।
नैनीताल। उत्तराखंड की सियासत में भूचाल लाने वाले कांग्रेस के नौ बागी विधायकों को हाईकोर्ट से करारा झटका लगा है। कोर्ट ने उनकी सदस्यता समाप्त करने के खिलाफ दायर याचिका खारिज करते हुए स्पीकर के आदेश को सही करार दिया है। न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की अदालत ने सोमवार को अपना फैसला सुनाते हुए कहा है कि सभी नौ बागी विधायक 10 मई को होने वाले फ्लोर टेस्ट के दौरान मतदान नहीं कर सकेंगे। साथ ही याचिकाकर्ताओं से कहा है कि यदि वे चाहे तो स्पीकर के समक्ष पुनर्विचार अर्जी दायर कर सकते हैं। इस याचिका पर लगभग एक माह तक सुनवाई चली, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दोनों पक्षों से पैरवी की।
बता दें कि हाईकोर्ट में आठ बागी विधायक सुबोध उनियाल, शैला रानी रावत, उमेश शर्मा काऊ, कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन, हरक सिंह रावत, अमृता रावत, शैलेंद्र मोहन सिंघल व प्रदीप बत्रा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर 27 मार्च को स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल की ओर से उनकी सदस्यता को समाप्त करने के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने हाईकोर्ट में अपनी सदस्यता समाप्त करने के खिलाफ याचिका दायर नहीं की थी।
कांग्रेस के बागी विधायकों ने अपनी याचिका में कहा था कि स्पीकर का आदेश प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है। उन्होनें दुर्भावना व राजनैतिक से प्रेरित होकर बिना सुनवाई का मौका दिए आदेश पारित कर दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया था कि उन्होंने मुख्यमंत्री हरीश रावत को बदलने की मांग की थी। अपनी पार्टी की कभी भी खिलाफत नहीं की, इसलिए उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होता है। जबकि स्पीकर के अधिवक्ताओं ने इन तर्कों का खंडन करते हुए कहा था कि बागी विधायकों ने भाजपा के साथ मिलकर अपनी ही सरकार को गिराने का षड्यंत्र किया। साथ ही संयुक्त रूप से भाजपा विधायकों के साथ सरकार की बर्खास्तगी के लिए राज्यपाल को ज्ञापन भी दिया।
स्पीकर की ओर से कहा गया कि नौ बागी विधायक संविधान की दसवीं अनुसूची व दल-बदल कानून के दायरे में आते हैं। न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की अदालत ने याचिकाकर्ता बागी विधायकों की याचिका को खारिज करते हुए स्पीकर के आदेश को सही ठहराया है। इस याचिका पर बागी विधायकों की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सीए सुंदरम व दिनेश द्विवेदी तथा स्पीकर की ओर से पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल, अमित सिब्बल, अवतार सिंह रावत व कार्तिकेहरि गुप्ता ने पैरवी की थी।