Exclusive interview of Congress Vice President Rahul Gandhi
अति आत्मविश्वास, अति उत्साह, टीम पीके और वायरल हो रहे वीडियो के भरोसे रहे मुख्यमंत्री कांग्रेस के खेवनहार नहीं बन सके। पार्टी के नेता को दरकिनार करना उनको भीमताल में भारी पड़ा तो रोड शो, रैली और ताबड़तोड़ सभाएं भी जिले में कांग्रेस के काम नहीं आई। 11 फरवरी को रुद्रपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद चले अंडर करंट ने कांग्रेस को कोमा में पहुंचा दिया। सीएम न तो कांग्रेसी कुनबा सहेज सके और न कांग्रेस को दोबारा सत्ता दिला पाए। साथ ही स्वयं भी विधानसभा तक नहीं पहुंच सके।
कांग्रेस के बड़े नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के बाद चुटकी लेने से बाज नहीं आए। मुख्यमंत्री, वित्त मंत्री और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रधानमंत्री के भाषण को जुमलेबाजी करार देते रहे। सात मार्च को हल्द्वानी आए मुख्यमंत्री ने साफ कहा था कि प्रधानमंत्री पद की गरिमा के अनुरूप जनता को मोदी अपने साथ नहीं ला सके। उन्होंने कुमाऊं से 20 से 22 और गढ़वाल से 25 से 27 सीट मिलने का दावा किया था। दस मार्च को वित्त मंत्री डॉ. इंदिरा हृदयेश ने भी 35 से 37 सीटें आने का दावा किया था। साथ ही अपनी जीत को लेकर भी कहा था कि 2012 से बड़ा होगा जीत का अंतर। मुख्यमंत्री ने प्रचार के दौरान पहाड़ से पलायन को लेकर खूब चिंता जताई। साथ ही गाड़, गधेरे, भट्ट, गहत, मडुवा और झिंगोरा को लेकर भी चुनाव का रुख मोड़ने का प्रयास किया। ये अलग बात है कि पलायन की बात कर रहे रावत स्वयं पहाड़ से पलायन कर गए और मुस्लिम-दलित समीकरण वाली सीटों से ताल ठोंकी। हालांकि ये समीकरण भी उनके काम नहीं आया। मुख्यमंत्री पेंशन योजना समेत अन्य योजनाओं को लेकर अपनी पीठ थपथपाते रहे लेकिन जनता की नब्ज नहीं पकड़ सके। कांग्रेस नोटबंदी को लेकर भी खासा मुखर नहीं हो पाई। प्रधानमंत्री को लेकर युवा खासे उत्साहित थे और 11 मार्च को रुद्रपुर में हुई प्रधानमंत्री की रैली समीकरण बदल गई। प्रधानमंत्री के आने के बाद भाजपा के पक्ष में पैदा हुए अंडर करंट को पढ़ने में कांग्रेस के बड़े नेता नाकाम रहे। रामनगर और कालाढूंगी सीट पर भी सीएम ने विशेष तौर पर फोकस किया था मगर नतीजा सिफर ही रहा।
खास बात ये रही कि एकला चलो की राह पर चल रहे मुख्यमंत्री रावत के सामने कई बार ऐसे अवसर आए जब उन्हें अपने रूठे मंत्रियों को कोप भवन से मनाकर बाहर लाना पड़ा था। रावत को लेकर समय-समय पर सरकार में विरोध के सुर उठते रहे साथ ही संगठन से भी सामंजस्य बेहतर नहीं था। कई बार कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने भी बयानबाजी कर रावत को असहज किया। राजनीति के मंझे खिलाड़ी माने जाने वाले रावत न तो कांग्रेसी कुनबे सहज सके, न कांग्रेस को सत्ता वापस दिला सके और न ही स्वयं विधानसभा तक पहुंच सके। हां उन्होंने समय-समय पर ये जरूर कहा कि बागियों की जीत उत्तराखंड की हार होगी और एक भी बागी चुनाव नहीं जीतेगा।