सहकारिता के नामित सदस्यों की वापसी में कांग्रेस बुरी तरह से उलझ गई है। सहकारिता के नामित सदस्यों की वापसी में बागियों का पेच आड़े आ रहा है। नामितों की वापसी का मतलब है कि जसपुर और सितारगंज में भी कांग्रेस के बागियों के हाथ मजबूत करना। कांग्रेस ऐसा करने को बिल्कुल भी तैयार नही है। दूसरी और, कांग्रेस यह संकेत भी देना नहीं चाहती कि बागियों के नाम पर संगठन को नुकसान पहुंचे।
प्रदेश में राष्ट्रपति शासन के दौरान प्रारंभिक कृषि ऋण समितियों और अन्य सहकारी संस्थाओं से संबंधित करीब 800 सहकारी सदस्यों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। ये सभी वे सदस्य थे जिनको सरकार की ओर से नामित किया गया था।
सहकारी संस्थाओं का कार्यकाल अभी करीब दो साल का बाकी है। इस स्थिति को देखते हुये अब बाहर हो कांग्रेसियों को वापस लाने की कोशिश भी की जा रही है। सब कुछ ठीक होता पर इसमें कांग्रेस के बागी जसपुर से शैलेंद्र मोहन सिंघल और सितारगंज से पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के क्षेत्र की सहकारी संस्थाओं के नामितों का पेच फंस गया है। सहकारिता मंत्री यशपाल आर्य यह कतई नहीं चाहते कि इन क्षेत्रों की सहकारी संस्थाओं के नामित सदस्यों को वापस लिया जाए। माना जा रहा है कि ऐसा करने पर शैलेंद्र मोहन सिंघल और विजय बहुगुणा को ही मजबूत करना होगा। कहा जा रहा है कि सोच समझ कर ही इस मामले में कोई कदम उठाया जाएगा।
कांग्रेस यह संकेत भी नहीं देना चाहती कि बागियों के नाम पर कांग्रेस एक तरफा कदम उठा रही है। ऐसे में इन क्षेत्रों में कांग्रेस संगठन के और कमजोर होने की भी आशंका से भी इनकार नहीं किया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक सितारगंज और जसपुर के कुछ नामित सदस्यों ने मुख्यमंत्री हरीश रावत से मुलाकात कर वापसी की भी मांग भी की थी। खुद मुख्यमंत्री हरीश रावत चुनाव को देखते हुये इनकी बहाली के पक्ष में भी हैं। दूसरी तरफ, वर्तमान समीकरणों को देखते हुये हरीश रावत सहकारिता मंत्री यशपाल आर्य को नाराज करने का खतरा उठाने के पक्ष में भी नही है। ऐसी स्थिति में अन्य जिलों के नामित सदस्यों की वापसी का मामला भी अधर में अटक कर रह गया है। अन्य नामित सदस्य भी अब वापसी के लिए जोर लगा रहे हैं और इनका कहना है कि दो साल तक बाहर बैठे रहने का कोई सवाल नही है।