विभिन्न मुद्दों को लेकर पाकिस्तान का समर्थन करने के बाद से ही सोशल साइट्स पर चीन निर्मित उत्पादों के विरोध की मुहिम चल रही थी। खासकर लोग दीपावली पर चीन निर्मित उत्पादों के बहिष्कार की बात कर रहे थे, लेकिन त्यौहार पर यह अपील हवाई साबित हुई और तमाम अपीलें सोशल साइट्स तक ही सीमित दिखीं।
कम से कम अपने जिले के पर्वतीय क्षेत्रों में तो यही तस्वीर देखने को मिली। बाजार में चीन निर्मित विद्युत मालाओं, शोपीस और लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों समेत अन्य सामान की न केवल जमकर खरीददारी हुई, बल्कि अधिकांश घर और प्रतिष्ठान भी चीनी विद्युत मालाओं से ही रोशन नजर आए। देसी विद्युत मालाएं बाजार में खोजने पर भी नहीं मिलीं।
करीब एक दशक पहले तक दीपावली में अधिकांश लोग अपने घरों को देशी विद्युत मालाओं से ही रोशन करते थे। कुछ बाजार से बनी बनाई मालाएं खरीदते थे, जबकि अधिकांश लोग लीची माला तैयार करने के लिए तार, बल्ब और लीची के आकार के प्लास्टिक के कवर खरीदकर घरों में ही माला तैयार करते थे।
हालांकि इस माला की लागत अधिक आती थी। बाद के वर्षों में जैसे ही चीन निर्मित मालाएं बाजार में आईं तो अपनी लीची मालाएं गायब हो गईं। इस बार दीपावली से पहले जब लोग एक-दूसरे से सोशल मीडिया में चीन निर्मित सामग्री के बहिष्कार की अपील कर रहे थे तो लग रहा था कि शायद यह अपील कारगर साबित होगी, लेकिन त्यौहार से पहले और त्यौहार के दिन ऐसा कहीं नजर नहीं आया।
महालक्ष्मी त्यौहार के दिन नैनीताल, भवाली, भीमताल, धारी, बेतालघाट, ओखलकांडा, रामगढ़, मुक्तेश्वर समेत आसपास के क्षेत्रों के सभी घर और प्रतिष्ठान चीन निर्मित मालाओं, शोपीस, भगवानों की मूर्तियां और मोमबत्तियां से सजे नजर आए।
इस संबंध में दुकानदारों का कहना था कि चीन निर्मित सामान काफी समय पहले ही बाजार में आ गया था, लिहाजा उसे निकालना उनकी मजबूरी थी। उनका कहना था कि देसी विद्युत मालाएं चीन निर्मित मालाओं से कहीं अधिक महंगी होती हैं, इसलिए अब न तो कोई उसे बनाता है और न ही उसका कच्चा माल (खोखे और बल्ब आदि) बाजार में मिलता है।
मिट्टी के दीयों को मिली ज्यादा तवज्जो
सोशल मीडिया पर जारी अपील का इतना असर जरूर हुआ कि इस बार लोगों ने दीपावली पर मोमबत्ती के बजाए मिट्टी के दीयों को अधिक तवज्जो दी। यही नहीं, अधिकतर लोगों ने शहीदों के नाम पर भी दीये जलाए। हर साल मिट्टी के दीयों और मूर्तियों के विक्रेता रामबाबू गुप्ता ने बताया कि इस बार मिट्टी के दीये पिछले वर्षों की तुलना में कहीं अधिक बिके।