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Nainital News: बच्चे स्कूल चले तो बादल फिर मचले

Wed, 19 Jul 2023 02:14 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
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हल्द्वानी। स्कूल खुलते ही बादल फिर मचलने लगे हैं। मानसून में अक्सर ये देखने को मिलता है कि जब भी मौसम विभाग की चेतावनी को देखते हुए स्कूल बंद किए जाते हैं तब बारिश नहीं होती और जब स्कूल खुलते हैं तो घनघोर घटा छा जाती है। विद्यार्थियों के स्कूल जाने पर बारिश खलल डाल देती है। मंगलवार को भी ऐसा ही हुआ। सप्ताह भर की छुट्टी के बाद जब स्कूल खुले तो सुबह से ही झमाझम बारिश होने लगी। इससे छात्र-छात्राओं को स्कूल पहुंचने में मशक्कत करनी पड़ी। इस बीच अमर उजाला की टीम ने स्कूलों में जाकर हालात का जायजा लिया तो स्कूलों में छात्रसंख्या 50 से 75 फीसदी तक रही। इस बीच उजागर हुई जर्जर स्कूल भवनों की हकीकत। कहीं भवन टपक रहे थे तो कहीं जलभराव की समस्या से बच्चे जूझते दिखे। पेश है संवाददाता मयंक जोशी की रिपोर्ट...
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मेरिट में आने वाली छात्राओं के विद्यालय का भवन जर्जर
हल्द्वानी। उत्तराखंड बोर्ड की परीक्षा में टॉपर्स देने वाले जीजीआईसी धौलाखेड़ा की जर्जर इमारत में छात्राएं खतरे के साये में बैठकर भविष्य की इबारत लिख रहीं हैं। बरिश में यहां हालात और बदतर हो जाते हैं। अमर उजाला की टीम विद्यालय पहुंची तो बरामदे में छात्राएं पढ़ती दिखाई दीं। यहां तीन कक्षाएं बरामदे में ही संचालित हो रहीं थीं। हॉल समेत क्लासरूम में पानी जमा हो गया है और दीवारें, छत सीलन से खराब हो चुकी हैं। छात्राओं ने बताया कि बरसात के दौरान अनहोनी का डर बना रहता है। पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है।

1976 में बना जीजीआईसी धौलाखेड़ा का मुख्य भवन अपनी मियाद पूरी कर चुका है। 22 कमरों वाले दोमंजिला भवन में खतरे की स्थिति को देखते हुए दूसरी मंजिल पर प्रवेश वर्जित है। यहां रैलिंग और दीवारें किसी भी वक्त भरभराकर गिर सकती है। बरसात के दिनों में यहां सैलाब की स्थिति रहती है। पानी रिसकर निचली मंजिल में भी पहुंचता है। शिक्षा विभाग ने 14 कमरों के ध्वस्तीकरण के आदेश भी जारी किए हैं लेकिन अभी तक ध्वस्तीकरण नहीं किया गया। स्कूल में 650 छात्राएं अध्ययनरत है। शिक्षण व्यवस्था को सुचारू करने के लिए 12 नए कमरे बनाएं गए हैं लेकिन कक्षाएं अधिक होने के कारण जर्जर भवन में भी छात्राएं पढ़ रही हैं।
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विषम हालात में पढ़ाई कर छात्राओं ने बढ़ाया था स्कूल का मान
जीजीआईसी धौलाखेड़ा की छात्रा प्रियंका कांडपाल ने इंटर की परीक्षा में 500 में से 480 अंक प्राप्त कर राज्य में छठा और जिले में दूसरा स्थान प्राप्त कर स्कूल का मान बढ़ाया था। हाईस्कूल में स्कूल की छात्रा कविता बिष्ट और चांदनी शर्मा ने भी मेरिट सूची में जगह बनाई थी। हाईस्कूल में 27 और इंटरमीडिएट में 18 छात्राओं ने सम्मान सहित परीक्षा पास की थी।

राजकीय कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालय फूलचौड़ भी जर्जर
हल्द्वानी। 74 छात्र संख्या वाले राजकीय कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालय फूलचौड़ में मंगलवार को 13 विद्यार्थी ही पहुंचे थे। सभी विद्यार्थियों को एक ही कक्षा में बैठाकर पढ़ाई करवाई जा रही थी। इस स्कूल में चार कक्ष ध्वस्तीकरण की कगार पर हैं इस कारण बारिश में यहां छात्रों की पढ़ाई करना खतरे से खाली नहीं है। विद्यालय में सिर्फ दो ही कमरे ठीक हालत में हैं इनमें से एक में प्रधानाचार्य कक्ष और कार्यालय संयुक्त रूप से चल रहा है और दूसरे कमरे में कक्षा छह से आठ तक के बच्चे एक साथ पढ़ाई करते दिखाई दिए। वहीं राजकीय प्राथमिक विद्यालय फूलचौड़ की हालत ठीक ठाक है, यहां 150 छात्र संख्या है लेकिन बरसात के कारण करीब 50 बच्चे ही स्कूल पहुंचे थे। यहां छुट्टी के बाद छात्र और शिक्षक अभिभावकों के आने इंतजार करते दिखाई दिए।

जिले में 61 विद्यालय जर्जरहाल
हल्द्वानी। शिक्षा विभाग में दर्ज आंकड़ों के अनुसार, नैनीताल जिले में 61 विद्यालय जर्जरहाल हैं। इन्हें डी श्रेणी में रखा गया है। इनमें सात राजकीय माध्यमिक विद्यालय जीआईसी मंगोली, जीआईसी गुनियालेख, जीआईसी मोतीनगर, जीआईसी दौलतपुर, जीएचएसएस पोखरी, जीआईसी प्यूरा और जीआईसी पतलकोट शामिल हैं। इसके अलावा बेतालघाट विकासखंड में आठ, ओखलकांडा में 13, रामगढ़ और भीमताल में एक-एक, रामनगर में 14, धारी में तीन, हल्द्वानी में सात, कोटाबाग में सात प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय जीर्ण-शीर्ण हालत में हैं। मानसून सीजन के मद्देनजर शिक्षा विभाग की ओर से जिले में खस्ताहाल विद्यालयों का ब्लॉकवार आंकड़ा तैयार किया जा रहा है।


न बच्चों में भीगने का रहा चाव, न रही वह कागज की नाव

हल्द्वानी। बच्चों की सेहत को लेकर अभिभावकों की चिंता का असर यह है कि अब बच्चे न तो बारिश में बेफ्रिक भीगते हैं और न ही कागज की नाव बनाकर उन्हें तैराते दिखाई पड़ते हैं। उल्टा रंग-बिरंगे छाते और रेनकोट के आने के बाद तो रैनी डांस को भी बच्चे भूल चुके हैं।
अब छपाक छई करने के लिए बच्चों को पहले मम्मी की इजाजत लेनी पड़ती है। फिर एक छीक आने पर ही दादी-नानी के नुस्खों से गुजरना पड़ता है। घर से स्कूल तक बीमार पड़ने के नाम पर डांट अलग सुननी पड़ती है। एक दशक पुराने हालात इसके उलट रहे हैं। तब छाता बैग में शो-पीस बनता था। बच्चे बारिश में इस तरह नाचते थे जैसे बरखा आने पर जंगल में मोर। न तो घर पर डांट खाने की चिंता होती थी और न ही कोई दबाव था। बिना किसी डर के चाव से भीगते थे। पता था कि कितनी भी मस्ती करो, घर जाकर मां तौलिये और गर्म नाश्ते के साथ स्वागत करेगी। तब बारिश में स्कूल जाना किसी बहादुरी भरे कार्य से कम नहीं होता था। आज स्कूली बच्चे के लिए एक डेली रुटीन वाले कार्य समान है। अधिकांश दिनों में तो मौसम विभाग के अलर्ट के चलते बारिश में स्कूल जाने का मौका ही नहीं मिलता। संवाद

कोट- जीर्ण शीर्ण अवस्था में पहुंच चुके विद्यालयों की ब्लॉकवार नई सूची बनाई जा रही है। आपदा प्रबंधन की ओर से इसका सर्वेक्षण किया जाएगा और रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी। पूर्व में जो विद्यालय चिह्नित किए गए थे। उनमें से कई जीर्ण शीर्ण भवनों का ध्वस्तीकरण किया गया है। जो भवन ध्वस्त किए जाने हैं, उनकी कार्यवाही की जा रही है। -केएस रावत, मुख्य शिक्षा अधिकारी।
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