मौन पालन केंद्र ज्योलीकोट में गोलमाल का मुद्दा प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंच गया है। विभाग ने अपात्रों को मौन पालन योजना के तहत सब्सिडी का लाभ दिया है। इतना ही नहीं मौन पालन बक्सों की ढुलाई भाड़े में भी हेराफेरी की है। आरटीआई में इस गोलमाल का खुलासा होने से खलबली मची है।
स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए मौन पालन पर सरकार सब्सिडी देती है। मानस विहार हल्द्वानी निवासी ललित मोहन नेगी के मुताबिक मौन पालन केंद्र ज्योलीकोट ने वर्ष 2012-13 में मौन पालने के लिए 50 लोगों को सब्सिडी का लाभ दिया। सब्सिडी देने से पहले विभाग ने आवेदन करने वाले लाभार्थियों की जांच नहीं कराई। मनमाने तरीके से लाभार्थियों को सब्सिडी का लाभ दे दिया। इनमें कई लोगों ने तो सिर्फ सब्सिडी हड़पने के लिए आवेदन किया था। विभाग ने गौलापार कुंवरपुर में दो सगे भाइयों को सब्सिडी का लाभ दिया है। इनमें एक भाई नाबालिग है। दोनों भाइयों को 59500-59500 हजार रुपए की सब्सिडी दी गई है।
नेगी के मुताबिक मौन पालन डिब्बों की ढुलाई का भाड़ा भी सरकार वहन करती है। मैदानी इलाकों में 42 रुपए और पर्वतीय इलाकों में 63 रुपए प्रति डिब्बा ढुलाई भाड़ा है। मौन पालन केंद्र के अधिकारियों ने ढुलाई भाड़े में भी हेराफेरी कर सरकार को चूना लगाया है। ललित नेगी का आरोप है कि 21 जुलाई 2012 को गौलापार से स्वार रामपुर के लिए मौन पालन डिब्बों की ढुलाई कराई गई। विभाग ने ट्रांसपोर्ट के ढुलाई बिलों में गड़बड़ी की। इसमें गौलापार से स्वार की दूरी 130 किलोमीटर दर्शाई, जबकि इसकी दूरी करीब 100 किलोमीटर है। इसमें भी ढुलाई भाड़ा 42 रुपए के बजाए 63 रुपए का बिल बनाया गया। आरोप है कि गोलमाल विभागीय अफसरों की मिलीभगत से हुआ है।
ललित मोहन नेगी के आरोप बेबुनियाद हैं, जिन लाभार्थी को सब्सिडी का लाभ दिया गया उनके पते का सत्यापन कराने के लिए राशन कार्ड मांगे गए थे। कार्ड में लाभार्थी के बालिग और नाबालिग होने की पुख्ता जानकारी नहीं होती है। जहां तक मौन पालन बक्सों के ढुलाई भाड़े का सवाल है उस समय मैदानी और पर्वतीय इलाकों में ढुलाई भाड़ा बराबर था। - रामेश्वर सिंह, मौन पालन विभाग ज्योलीकोट