मगरमच्छों के व्यवहार में बदलाव आ रहा है। उनको नदी, डैम, जलाशय नहीं बल्कि छोटे और दूषित पानी वाले नाले रास आ रहे हैं। तराई पूर्वी वन प्रभाग के सुरई रेंज में स्थित खकरा नाले में 60 मगरमच्छों की गिनती वन महकमा कर चुका है। इसी तरह दूसरे नालों में भी मगरमच्छों की उपस्थिति मिली है। मगरमच्छों को नाला क्यों रास आ रहा है? इसका सटीक कारण वनाधिकारी भी तलाश नहीं पाए हैं। अब महकमे ने इसका पता लगाने के लिए वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया से मदद लेने की योजना बनाई है।
पश्चिम वृत्त के प्रभागों (तराई के जंगलों) में तराई पूर्वी वन प्रभाग मगरमच्छों की गणना का काम कर रहा है। इसके तहत विभाग ने नानक सागर समेत कई जलाशयों में गणना की है, लेकिन गणना करने वाली टीम को जलाशयों की जगह संकरे, छोटे और तुलनात्मक तौर पर कम साफ पानी वाले नालों में मगरमच्छों की अच्छी-खासी संख्या मिली है। गणना कर रहे वन्यजीव विशेषज्ञ शाह बिलाल कहते हैं कि केवल तराई पूर्वी वन प्रभाग में स्थित सुरई रेंज में करीब पांच किमी खकरा नाले में 60 मगरमच्छों की गणना की गई है।
इतनी छोटी जगह पर यह एक बड़ी संख्या है। इसी तरह लालकुआं के पास घोड़िया नाला, सितारगंज में सिडकुल के पास भी एक तालाबनुमा जगह पर मगरमच्छों का वास है। उप प्रभागीय वनाधिकारी एनसी पंत कहते हैं कि यह हमारे लिए अभी अचरज का विषय है कि आखिरकार नाले वाली जगह ही मगरमच्छों को क्यों पसंद आ रहा है। व्यवहार में यह बदलाव का कारण क्या है, इसका हम भी अपने स्तर से पता करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा इसका अलग से अध्ययन कराने की भी योजना है। मगरमच्छ की गणना का काम पहली बार हो रहा है। इसकी रिपोर्ट अप्रैल तक तैयार होने की संभावना है।