जालसाजी का भी दिया था हवाला
इसके प्रमाण में उन्होंने डाक विभाग का हलफनामा भी दिया जिसमें इसकी पुष्टि की गई थी। याचिका के अनुसार डीओपीटी ने इसी मामले में एक अन्य रिट के जवाब में दावा किया था कि चतुर्वेदी का आवेदन 29 मई 2020 को मिला था जब आवेदन की अंतिम तिथि निकल चुकी थी। इस आधार पर इसे अस्वीकार कर दिया गया था।
विवाद के अन्य मामले में डीओपीटी का दावा था कि देहरादून में वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई), जहां से चतुर्वेदी ने स्नातकोत्तर डिग्री का दावा किया था, वह एक गैर-मान्यता प्राप्त संस्थान है और अधिकारी की जन्म तिथि और कार्य अनुभव में भी विवाद है। याचिका में अधिकारी ने साक्षात्कार के लिए योग्य उम्मीदवारों को बुलाने और किसी विशेष उम्मीदवार के पक्ष में उसकी कूलिंग ऑफ अवधि में छूट देने के लिए कुछ अन्य जालसाजी का भी हवाला दिया था।
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कैट ने खारिज किया था मामला
इस संबंध में चतुर्वेदी ने जनवरी 2021 में उत्तराखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें एक अन्य अधिकारी के चयन आदेश को रद्द करने और जालसाजी और मनगढ़ंत आरोपों की सीबीआई जांच की मांग की गई थी। इस याचिका को मार्च 2023 में हाईकोर्ट ने कैट की सर्किट बेंच को भेज दिया था। कैट ने अपने फैसले में मामले को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि उनका आवेदन 20 मार्च 2020 को डीओपीटी के गलत अनुभाग में प्राप्त हुआ था। 29 मई 2020 को उनका आवेदन सही अनुभाग में प्राप्त हुआ था जो कि अंतिम तिथि से परे था।