कांग्रेस का पर्दाफाश करने निकली भाजपा को अपने ही कद्दावर नेताओं को परदे में रखना पड़ रहा है। पिथौरागढ़, जागेश्वर जैसी विधानसभाओं में हरक सिंह की हनक दिखाई दी तो तराई में कई स्थानों पर पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के प्रभाव का उपयोग भाजपा को करना पड़ा।
भाजपा का कहना तो यह है कि ये नेता गैर भाजपा वाले क्षेत्रों तक ही सीमित रहेंगे, पर भाजपा के कद्दावर नेताओं की अब तक की इन रैलियों से दूरी बता रही है कि भाजपा और कांग्रेस से आकर भाजपाई बने नेताओं के बीच के समीकरण अभी सहज नहीं हो पाए हैं।
कुछ समय पहले ही भाजपा की हल्द्वानी में हुई प्रदेश कार्यसमिति में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने यह साफ संकेत दिया था कि कांग्रेस के बागी नेताओं को भाजपा में पूरी तवज्जो मिलेगी।
विजय बहुगुणा को तो उस समय भाजपा ने अपना पूर्व मुख्यमंत्री बता कर बहुगुणा को कोश्यारी, खंडूड़ी और निशंक की पांत में खड़ा कर दिया था। हरक सिंह मंच पर नहीं थे पर कार्यसमिति में उन्हें तवज्जो पूरी मिली थी।
अब भाजपा की पर्दाफाश रैलियों से हल्द्वानी का यह संकेत और पुख्ता होता दिख रहा है। पिथौरागढ़ और विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल के विधानसभा क्षेत्र जागेश्वर के दन्या क्षेत्र में हुई पर्दाफाश रैली में हरक की हनक दिखाई दी।
यहां न भगत दा दिखे, न खंडूड़ी, न निश्ंाक और न ही नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट। इन रैलियों से भाजपा के कद्दावर नेताओं की दूरी का एक निहितार्थ यह भी निकाला जा रहा है कि बहुगुणा-हरक की जोड़ी से भाजपा नेताओं के रिश्ते अभी सहज नहीं हो पाए हैं।
अल्मोड़ा में 29 को प्रस्तावित पर्दाफाश रैली मेें पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी पहुंच रहे हैं। हालांकि अल्मोड़ा भी गैर भाजपाई सीट है और पिछले दो चुनाव में यह कांग्रेस के कब्जे में रही हैं। यहां शायद ही बहुगुणा-हरक की उपस्थिति हो।
ऐसे में इस बात से भी इनकार नहीं किया जा रहा है कि अमित शाह का यह दाव उल्टा भी पड़ सकता है। गैर भाजपा विधायकों वाले क्षेत्रों में भाजपा का उभरता नेतृत्व कांग्रेस से आए नेताओं का साथ बनाए रखने में कोताही बरत सकता है। सितारगंज में यह दिख भी रहा है। सौरभ बहुगुणा की कोर टीम से भाजपाई अभी जुड़ नहीं पाए हैं।