मार्केट में पांच सौ और एक हजार के नोट बंदी से प्रापर्टी का कारोबार चौपट हो गया है। जमीनों की खरीद फरोख्त बंद होने से रजिस्ट्री कार्यालय में सन्नाटा पसरा है। नोट बंदी के बाद से हल्द्वानी रजिस्ट्री कार्यालय में एक हफ्ते में मात्र 54 सेल डीड दर्ज हुई हैं।
जबकि हल्द्वानी में औसतन प्रतिदिन 45 से 50 सेल डीड होती थी। प्रापर्टी का धंधा चौपट होने से सरकारी राजस्व का भी जबर्दस्त नुकसान हो रहा है।
हल्द्वानी में प्रापर्टी की खरीद फरोख्त का बड़ा कारोबार होता है। प्रापर्टी में सबसे अधिक काला धन खपाया जाता है। सर्किल रेट की तुलना में ओपन मार्केट में प्रापर्टी की खरीद फरोख्त सात से दस गुना महंगी होती है। नेताओं और अफसरों का अधिकांश काला धन प्रापर्टी पर ही लगता है।
ब्लैक मनी से प्रापर्टी की खरीद फरोख्त होने की वजह से प्रापर्टी की कीमत काफी महंगी है। इससे आम आदमी के लिए जमीन खरीदना भर ही सपना हो जाता है। हल्द्वानी में अधिकांश सफेदपोशों का प्रापर्टी की खरीद फरोख्त का साइट बिजनेस है। पूरा कारोबार कमीशन के खेल पर चलता है।
पांच सौ और एक हजार के नोट बंदी के बाद प्रापर्टी के कारोबार में मंदी छा गई है। हल्द्वानी सब रजिस्ट्रार कार्यालय के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। हल्द्वानी में सब रजिस्ट्री आफिस के दो डिवीजन हैं। दोनों ही डिवीजन में नोट बंदी से पहले प्रतिदिन औसतन 45 से 50 रजिस्ट्री होती थी।
हर सेल डीड में सरकार को सर्किट रेट के हिसाब से स्टांप पर राजस्व मिलता था। इसके अलावा हर डीड पर विकास सेस भी मिलता था। नोट बंदी के बाद से रजिस्ट्री आफिस में सन्नाटा पसरा है। सब रजिस्ट्रार महेश धर द्विवेदी के मुताबिक नोट बंदी के बाद से प्रथम डिवीजन में मात्र 14 और द्वितीय डिवीजन में 40 सेल डीड हुई हैं। इस लिहाज से हफ्ते भर में पांच गुना सेल डीड कम हुई हैं।
रजिस्ट्री पर दो फीसदी रिश्वत
रजिस्ट्री आफिस में प्रत्येक सेल डीड पर कुल स्टांप ड्यूटी की दो फीसदी रिश्वत ली जाती है। बगैर रिश्वत दिए रजिस्ट्री नहीं होती है। आम से लेकर खास तक दो फीसदी रिश्वत देकर ही रजिस्ट्री करवाता है। रिश्वत भी सेल डीड दर्ज होने से पहले ही एडवांस दी जाती है। सेल डीड लिखने वाले कातिब के माध्यम से रिश्वत का लेनदेन होता है।
उधारी में भी नहीं मिल रहे खरीददार
प्रापर्टी का पूरा कारोबार टोकन मनी पर चलता है। कारोबारी काश्तकारों को एडवांस में टोकन मनी देकर उनकी जमीन पर प्लाट काटते हैं। प्लाट बिकने के साथ काश्तकार को भुगतान होता है। काश्तकार और प्रापर्टी डीलर के बीच महीनों अथवा साल भर का अनुबंध होता है।
अनुबंध की शर्त के मुताबिक निर्धारित अवधि तक बकाया भुगतान नहीं होने पर टोकन मनी लैप्स हो जाती है। प्रापर्टी की खरीद फरोख्त चौपट होने से कारोबारियों को टोकन मनी लैप्स होने का डर सता रहा है। कारोबारी सर्किट रेट पर ही जमीनों की खरीद के ग्राहक ढूंढ रहे हैं।
डीलरों के मुताबिक सर्किल रेट पर रजिस्ट्री करवाकर बकाया मार्केट रेट की धनराशि उधारी में देने को तैयार नहीं हैं। फिर भी ग्राहक नहीं मिल रहे हैं।