यूं तो पहाड़ आपदाओं के लिए ही जाना जाता है, पर पहाड़ में सड़क भी आपदा का पर्याय बनती नजर आ रही है। राज्य आपदा प्रबंधन केंद्र ने प्रदेश में सड़क हादसों की बढ़ती संख्या को देखते हुये दुर्घटनाओं को आपदा घोषित करने तक को कहा है। हालात यहां तक बिगड़ चुके हैं कि पहाड़ में मैदान के मुकाबले कम सड़क हादसाें के बावजूद मरने वालोें का प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है।
कुमाऊं के पर्वतीय जिलों में पिथौरागढ़ में यह सबसे अधिक है। राज्य आपदा प्रबंधन तंत्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसका कारण जागरूकता का अभाव, वाहनों के निरीक्षण में लापरवाही, सड़कों के रखरखाव को तवज्जो न मिलना आदि मुख्य रूप से उभर कर सामने आ रहा है।
राज्य आपदा प्रबंधन केंद्र की रिपोर्ट में सड़क हादसों के विश्लेषण के आधार पर सड़क हादसों में मृत्यु सूचकांक की गणना की गई है। पूरे उत्तराखंड के लिए यह सूचकांक 1.6 निकल कर आया है। सूचकांक से यह भी सामने आ रहा है कि सड़क हादसों में घायलों की तुलना में मरने वालों की संख्या अधिक है। हालांकि प्रदेश में उत्तरकाशी एक मात्र ऐसा जिला है जिसमें सूचकांक एक से अधिक है। इसका मतलब यह भी हुआ कि उत्तरकाशी में सड़क हादसों में घायलोें की अपेक्षा मरने वालों की संख्या अधिक है।
यही हाल कुमाऊं में पिथौरागढ़ का भी है। पिथौरागढ़ के लिए यह सूचकांक 0.6 निकल कर आया है। अधिकारियों के मुताबिक 0.5 से अधिक सूचकांक होने का मतलब है कि सड़क हादसों में मृत्यु दर अधिक है। इसका एक कारण हादसों के बाद उपचार की पर्याप्त सुविधाओं का न होना भी है। चिंता वाली बात यह भी है कि यह सूचकांक नैनीताल और अल्मोड़ा के लिए भी करीब 0.5 है। बागेश्वर और चंपावत के लिए यह सूचकांक 0.2 पाया गया है।
राज्य आपदा प्रबंधन केंद्र ने सड़क हादसों की लगातार बढ़ती संख्या को देखते हुये सड़क हादसों को आपदा घोषित करने का सुझाव भी दिया है। केंद्र का कहना है कि सड़क हादसों में जान गंवाने वालों के परिजनों को उसी तरह से मुआवजा दिया जाना चाहिये जिस तरह से प्राकृतिक आपदा के मृतकों के परिजनों को दिया जाता है। आपदा घोषित होने पर सड़क हादसों की रोकथाम के उपाय भी और बेहतर तरीके से किये जा सकेंगे।