लगभग डेढ़ सौ करोड़ रुपये लागत से देवस्थल में स्थापित एशिया की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास वाली दूरबीन के स्थापित होने से लेकर उसके राष्ट्र को समर्पित होने तक इस परियोजना में जुटे बेल्जियम और भारत के खगोल वैज्ञानिकों ने कई उतार चढ़ाव देखे।
कई बार तो दिन रात की हाड़तोड़ मेहनत के बाद उन्हें निराशा हाथ लगती लेकिन वैज्ञानिकों ने हार नहीं मानी और समुद्र सतह से लगभग 2500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित देवस्थल की पहाड़ी में एशिया के सबसे बड़े टेलीस्कोप को शुरू कर देश भर के खगोल वैज्ञानिकों के लिए अंतरिक्ष में अध्ययन के नए रास्ते खोल दिए। इस परियोजना के शुरू होने के साथ ही एरीज के खगोल विज्ञानियों का लगभग दो दशक पुराना सपना भी साकार हो गया।
एरीज के निदेशक वहाबउद्दीन ने बताया कि एशिया की सबड़े बड़ी इस दूरबीन की स्थापना का सपना आज से लगभग दो दशक पहले खगोल वैज्ञानिकों ने देखा था। उन्होंने कहा कि देश के खगोल वैज्ञानिकों ने ही नहीं बल्कि कई अन्य संस्थानों के इंजीनियरों व कर्मचारियों ने भी इसके निर्माण में अहम योगदान दिया है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय से पहुंचे वैज्ञानिक प्रो. पीसी अग्रवाल ने टेलीस्कोप को दूरदर्शक यंत्र बताया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2004 में एरीज का नाम यूपी आब्जरवेट्री था। तब हमारे वैज्ञानिकों के पास केवल 1 मीटर व्यास वाली दूरबीन ही मौजूद थी जिससे खगोल विज्ञान के क्षेत्र में अपेक्षित काम नहीं हो पाता था। इस दूरबीन की स्थापना भी तब से तीन दशक पहले हुए थी।
प्रो. अग्रवाल ने बताया कि तब यूपी आबजरवेट्री के खगोल वैज्ञानिक खुद के भविष्य को लेकर चिंतित और आशंकित रहते थे लेकिन अब इस नई दूरबीन ने खगोल वैज्ञानिकों के सामने उनके सुनहरे भविष्य की इबारत लिख दी है।
प्रो.अग्रवाल ने बताया कि इस दूरबीन की स्थापना में कई दिक्कतें आई। हम चाहते थे कि इसका आप्टिक और कंट्रोल अलग अलग हो लेकिन ऐसा नहीं हो सका। इस दूरबीन के लेंस की कोटिंग रूस से कराने का प्लान था लेकिन इसमें भी सफलता नहीं मिली। 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन के लिए इतना बड़ा डोम (आवरण) भी तयशुदा समय से एक साल देरी से बना। उन्होंने बताया कि जब दूरबीन को स्थापित कर दिया गया था तो उसके कुछ समय बाद ही बरसात और आद्रता के चलते इसके लैंस में तकनीकी खराबी आ गई।
काफी प्रयासों के बाद जिसे ठीक किया जा सका। यही नहीं इस दूरबीन का मिरर जर्मनी में बनवाया गया जबकि उसमें पालिस करने का काम रूस में हुआ जिसमें लगभग 22 माह का समय लगा। उन्होंने बताया कि इन तमाम दिक्कतों के बावजूद वैज्ञानिकों ने हार नहीं मानी और अपने दो दशक पुराने सपने को साकार कर खगोल विज्ञान के क्षेत्र में समूचे एशिया में भारत का मस्तक ऊंचा कर दिखाया।
घंटों तक स्क्रीन पर नजरें गड़ाए गए केंद्रीय मंत्री व वैज्ञानिक
देवस्थल। भारत और बेल्जियम के प्रधानमंत्रियों को ब्रेसेल्स में बुधवार की शाम पौने छह बजे इस दूरबीन को एक्टीवेट करना था। तयशुदा समय पर केंद्रीय मंत्री डा. हर्षवर्धन समेत सभी चुनिंदा वैज्ञानिक और कुछ स्कूली बच्चों को दूरबीन कक्ष में ले जाया गया, लेकिन ऐन वक्त पर कुछ तकनीकी दिक्कत आ गई जिसके चलते तयशुदा समय पर दूरबीन एक्टीवेट नहीं हुई। उसके बाद ब्रेसेल्स से जानकारी मिली कि लगभग चालीस मिनट का समय और लगेगा। लेकिन चालीस मिनट बाद भी दूरबीन एक्टीवेट नहीं हुई। इस दौरान परियोजना प्रबंधक डा. ब्रजेश कुमार बार बार फोन पर दिल्ली और ब्रेसेल्स में संपर्क साधते रहे। शाम सात बजे के करीब दोनों देशों के पीएम ने दूरबीन को एक्टीवेट किया और तब तक दूरबीन कक्ष में खड़े लोग वहां लगे स्क्रीन पर नजरे गड़ाए रहे
लोकल मीडिया को दूरबीन कक्ष से दूर किया
देवस्थल। एरीज के वैज्ञानिकों ने स्थानीय प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया को दूरबीन कक्ष में प्रवेश नहीं करने दिया। जबकि दिल्ली से पहुंचे कुछ मीडिया कर्मियों की दूरबीन कक्ष में आवाजाही पर कोई रोक नहीं थी। इससे स्थानीय मीडिया कर्मियों में भारी गुस्सा देखा गया। उनका कहना था कि जब दूरबीन कक्ष में प्रवेश नहीं करने देना था तो फिर इस कार्यक्रम में उन्हें आमंत्रित भी नहीं करना चाहिए था।
केंद्रीय मंत्री ने ली राज्य के राजनैतिक हालात की जानकारी
देवस्थल। देवस्थल में कुछ देर विश्राम के बाद जैसे ही केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन कार्यक्रम स्थल की ओर रवाना होने लगे तो पास के ही एक कमरे में टीवी चैनल पर समाचार प्रसारित हो रहे थे। डा. हर्षवर्धन ने इस कमरे में पहुंचकर टीवी चैनल में उत्तराखंड की राजनैतिक स्थितियों पर चल रहे समाचार को सुना और वहां मौजूद वैज्ञानिकों से क्षण भर के लिए राज्य के राजनैतिक हालातों की जानकारी भी ली।
ग्रामीणों ने कोई विशेष खुशी नहीं
देवस्थल। एशिया की सबड़े बड़ी दूरबीन लगने के बाद भी देवस्थल और इसके आसपास के ग्रामीणों को कोई खास खुशी नहीं है। दूरबीन लगने के बाद जब ग्रामीणों से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि इस दूरबीन के लगने से न तो किसी ग्रामीण को नौकरी मिली है और न ही उन वन पंचायतों को फायदा हुआ है जिसने इसके लिए जमीन दी थी। अलबत्ता ग्रामीणों का कहना था कि दूरबीन लगने से गांव का नाम जरूर देश दुनिया तक पहुंच गया है।
अचानक बिगड़े मौसम के मिजाज
देवस्थल। देवस्थल में दिन भर सुनहरी और चटख धूप खिली रही लेकिन जैसे ही दूरबीन को एक्टीवेट करना का समय नजदीक आया अचानक आसमान काले बादलों से घिर गया और जोरदार धमाकों के साथ बिजली चमकने लगी। इस दौरान कुछ देर के लिए बूंदाबांदी भी हुई। बरसात शुरू होते ही पंडाल में मौजूद तमाम लोग वहां से इधर उधर हो गए।