हल्द्वानी। आम तौर पर डॉक्टर शब्द चर्चा में आने पर एक सीन खिंचता है। गले में आला डाले एक जहीन सा आदमी मरीजों को देखते हुए या फिर पर्चे पर दवाएं लिखता एक शख्स। लोग यह भी मानते हैं कि डॉक्टर को अस्पताल में होने वाली मौतों से कोई मतलब नहीं होता क्योंकि यहां अक्सर ऐसा होता है। लेकिन फोरेंसिक मेडिसन में डॉक्टर का इससे अलग रूप दिखता है। यहां डाक्टर के लिए लाश के मायने होते हैं। मरने वाले के शरीर पर लगी एक-एक चोट का दर्द डॉक्टर महसूस करता है ताकि पता चले कि मौत कैसे हुई? ये वह डॉक्टर होते हैं जो मौत के रहस्यों से पर्दा उठाते हैं। इनकी मदद से अपराधी सलाखों के पीछे पहुंचता है।
फोरेंसिक मेडिसन चिकित्सा विज्ञान की वह शाखा है जो कानून की मदद करती है। हत्या या किसी अन्य बड़ी आपराधिक वारदातों का खुलासा करने वाले इन डॉक्टरों के सामने मरीज को बचाने की नहीं मरने वाले को न्याय दिलाने की चुनौती होती है। डाक्टर को दवाएं बांटने की जगह घंटों लाशों की चीरफाड़ (पोस्टमार्टम) करनी होती है। मरने वाले के जख्मों को ‘कुरेदना’ पड़ता ताकि पता चले कि चोट मरने से पहले लगी है या बाद में। हल्द्वानी मेडिकल कालेज में फोरेंसिक मेडिसन फैकल्टी के विभागाध्यक्ष डा.सीपी भैसोड़ा कहते हैं कि डॉक्टर द्वारा मौके से लिया गया एक-एक सैंपल अपराधी की ओर इशारा करता है। थोड़ी सी चूक से पूरी न्यायिक प्रक्रिया गड़बड़ा सकती है। यह डॉक्टर का ऐसा रूप है जो इस पेशे के ग्लैमर और इसमें कमाई की अपार संभावनाओं से दूर है।
अपराध के खिलाफ इतनी महत्वपूर्ण ताकत होने के बावजूद इस पेशे में डॉक्टरों की कमी है। कुमाऊं में केवल तीन फोरेंसिक एक्सपर्ट हैं हल्द्वानी मेडिकल कालेज में। जबकि इसी वर्ष जनवरी में भारत सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने देश के सभी जिलों में दो-दो फोरेंसिक एक्सपर्ट तैनात करने के आदेश दिए हैं। ताकि हत्या, बलात्कार जैसे संगीन अपराध केवल पुलिस की सरसरी तफ्तीश पर खत्म न हों। चर्चित संजना हत्याकांड (लालकुआं) में बच्ची के शव के पास पड़े एक बाल से जांच शुरू करने वाले डा. सीपी भैसोड़ा भी मानते हैं कि फोरेंसिक एक्सपर्ट की कमी अपराधियों को मौका देती है। हत्या जैसे संगीन अपराधों में पोस्टमार्टम रिपोर्ट तक सही नहीं मिल पाती। इससे मौत के कारणों का तक पता नहीं चल पाता।