हल्द्वानी। बम-पटाखे की बत्ती में आग लगाई और तेज धमाके के साथ चौगुना उत्साह। हर तरफ यही सब तो दिखता है दिवाली में। परंपरा बेशक पुरानी है, लेकिन चंद समय की खुशी पूरे जीवन के लिए घातक भी। जिन पटाखों को जलाने में आनंद आता है उनका शोर आपको बहरा बना सकता है। 125 डेसीबल से अधिक शोर कानों के लिए खतरनाक माना गया है। यही नहीं इनके धुंए में शामिल नाइट्रोजन, सल्फर डाई आक्साइड जैसी गैस हृदय की धड़कनों को बढ़ाती है और गर्भस्थ शिशु पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है।
भीड़भाड़ वाले क्षेत्र में ध्वनि प्रदूषण की स्वीकार्य सीमा दिन में 55 डेसीबल और रात में 50 डेसीबल होती है। जबकि साइलेंट जोन में दिन में 45 डेसीबल तथा रात में 40 डेसीबल स्वीकार्यता रहती है। सामान्य दिनों में ध्वनि प्रदूषण स्वीकार्य सीमा से 15 से 20 डसीबल तक ज्यादा रहता है, लेकिन दिवाली के दिन यह तीन गुना तक बढ़ जाता है। आतिशबाजी का शोर ध्वनि प्रदूषण की स्वीकार्यतो को जितनी तेजी से बढ़ाता है, उसी तेजी से सेहत पर भी वार करता है।
पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस बार ठीक महालक्ष्मी पर्व के दिन शहर में ध्वनि प्रदूषण की मानिटरिंग का निर्णय लिया है। महालक्ष्मी से एक दिन पहले का स्तर भी जांचा जाएगा। प्रदूषण नियंत्रण बोर्र्ड के पास साउंड मीटर है और इसी से शहर के व्यस्ततम तथा साइलेंट जोन घोषित इलाकों में जांच होगी। बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी पीके जोशी ने बताया कि इसके लिए टीमें बनाई गई हैं। उनका कहना है कि जिस तरह से दिवाली में स्टैंडर्ड मानक से प्रदूषण अधिक बढ़ता है वह खतरनाक है। बच्चों और गर्भवती महिलाओं को इस आतिशी से दूर रखने की जरूरत है।