हल्द्वानी। जिस एक अदद कुर्सी का सपना लेकर निष्ठा का त्याग किया... विचारधारा बदली, दल बदला... वह मिल भी गई। दल बदलकर बागी बने प्रत्याशियों के सियासी गणित का अंदाजा भले ही अपने न लगा सके हों मगर उनकी जिद ने कमाल कर दिया। कई जगह बागियों ने या तो खुद जीत दर्ज की या दूसरे या तीसरे स्थान पर रहकर अपने दलों के सारे समीकरण गड़बड़ा दिए। ऐसे चंद नाम हैं जिन्होंने अपनी आस्थाएं बदलकर दूसरे दलों का दामन थामा और जनता ने उन्हें हाथों हाथ भी लिया। कई प्रत्याशी ऐसे भी रहे जो जिनके कारण अपनों के गले हार का ‘हार’ पड़ा।
सबसे ज्यादा खुशी लालकुआं में कांग्रेस के लाल चंद्र सिंह के खाते में गई। टिकट न मिलने से नाराज लाल चंद्र ने चुनाव के ठीक पहले भाजपा को अलविदा कहा तो कांग्रेस ने झटके से उन्हें लपक कर टिकट भी दे दिया। उन्होंने भाजपा के अरुण प्रकाश वाल्मीकि को 301 मतों के नजदीकी अंतर से शिकस्त भी दे डाली। यही हाल कालाढूंगी का रहा। यहां टिकट मांग रहे अली हुसैन के मन के भावों को कांग्रेस नहीं जान सकी। उन्होंने बगावत कर चुनाव लड़ा और सिर्फ 217 वोट के अंतर से पीछे रह गए। यहां कांग्रेस प्रत्याशी दीप चंद्र सती तीसरे स्थान पर रहे।
रामनगर में भाजपा की बागी भले चुनाव नहीं जीत पाई हों मगर उन्होंने भाजपा की रुचि गिरी शर्मा के सामने चुनाव के ठीक पहले और बाद में भी मुश्किलें खड़ी कर दीं। भाजपा के ही कई नेता ममता के समर्थन में सार्वजनिक रूप से आ गए थे। ममता के मैदान में आने से भाजपा का वोट बिखरा सा दिखा। खास बात यह कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट और प्रदेश प्रभारी श्याम जाजू भी नाराज पदाधिकारियों को नहीं मना सके। मामला मुख्यमंत्री तक पहुंचा तो प्रचार के लिए वन मंत्री हरक सिंह रावत और पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को उतारा गया। इसके बाद भी भाजपा का एक बड़ा धड़ा बागी ममता गोस्वामी के पक्ष में दिखाई दिया।
भीमताल में नगर पंचायत अध्यक्ष बने कांग्रेस के देवेंद्र चनौतिया बागियों से पार पाने में भले सफल हो गए हों मगर बगावत कर चुनाव लड़े हितेंद्र सिंह बिष्ट ने उनके लिए मुश्किल जरूर खड़ी कीं। सिर्फ 307 मतों के अंतर से जीत दर्ज हुई। भाजपा भी भितरघात के कारण तीसरे स्थान पर पहुंची। प्रत्याशी दिनेश सांगुड़ी को 1180 वोट पा सके।