हल्द्वानी। वन अनुसंधान संस्थान जंगलों से विलुप्त हो रही औषधीय वनस्पतियों के लिए संजीदा हो गया है। पर्यावरण संरक्षण और पलायन रोकने के मकसद से संस्थान ने तीन दिनी कार्यशाला का आयोजन किया है। इसमें वन अधिकारियों, कर्मचारियों को औषधीय वनस्पतियों का ज्ञान, पहचान, महत्व के साथ ही बाजार में मांग की जानकारी दी जा रही है। वक्ताओं ने बताया कि मुनाफे के लिए औषधीय वनस्पतियों का वैज्ञानिक दोहन होना चाहिए।
मंगलवार को वानिकी प्रशिक्षण अकादमी में शताब्दी भवन के सभागार में आयोजित कार्यशाला का शुभारंभ मुख्य वन संरक्षक डॉ. विवेक पांडे, विस्तार प्रभाग के डॉ. एके पांडे ने किया। डॉ. विवेक ने कहा कि कीड़ाजड़ी जैसी महत्वपूर्ण औषधीय वनस्पतियों का इस कदर अंधाधुंध दोहन किया जाता है कि ये विलुप्ति की कगार पर पहुंच जाती है। कहा कि ऐसी दर्जनों औषधीय वनस्पतियां हैं जिन्हें उगाकर पर्यावरण संरक्षण के साथ ही आर्थिक फायदा हो भी सकता है। उदाहरण देते हुए कहा कि लेमनग्रास की जबरदस्त मांग है बाजार में इसका दाम भी अच्छा मिलता है। इसकी खूबी यह है कि इसे जंगली जानवर नहीं खाते, कीड़े नहीं लगते और यह कम लागत में हो जाती है। बस इसका दोहन वैज्ञानिक ढंग से होना चाहिए। डॉ. एके पांडे ने हिमालयी राज्यों में पाई जाने वाली औषधीय वनस्पतियों का सतत उपयोग करते हुए इनकी खेती करने की अपील की ताकि खाली हो रहे गांव को फिर से आबाद किया जा सके। कार्यक्रम का संचालन वैज्ञानिक डॉ. देवेंद्र कुमार ने किया। इस दौरान डॉ. चरण सिंह, राम वीर सिंह, डॉ. वीपी टम्टा, अजय गुलाटी, विजय कुमार, पीके गुप्ता, चंदन सिंह अधिकारी आदि मौजूद थे।