हल्द्वानी। 15 साल के किशोर की खुदकुशी को अभी दो दिन ही बीते थे कि शहर में एक और नई पौध ने मौत को गले लगा लिया। इस बार बीए की छात्रा ने फांसी का फंदा लगाकर जान दे दी। घटना का पता तब चला जब घर वाले सुबह उठे। मौत के कारणों का पता नहीं चल सका है। परिवार वाले भी बेटी की खुदकुशी से हैरान हैं। पुलिस का कहना है कि मौत के कारणों की जांच की जाएगी।
जीवन लाल आर्य निवासी पनियाली मेहनत मजदूरी कर जीवन यापन करते हैं। उनकी बड़ी बेटी सावित्री एमबीपीजी कॉलेज में बीए द्वितीय वर्ष की छात्रा थी। रविवार की रात परिवार वाले खाना खाकर सो गए। जीवन पत्नी व बेटी भावना के साथ एक कमरे में सो गए जबकि सावित्री दूसरे कमरे में सोने चली गई। सोमवार सुबह देर तक सावित्री के कमरे का दरवाजा नहीं खुला। जीवन लाल ने उसे आवाज दी मगर कोई जवाब नहीं मिला। इस पर घर वालों का माथा ठनका उन्होंने दरवाजा खटखटाया तो भिड़ा था, चटखनी नहीं लगी थी। दरवाजा खोल कर देखा तो सावित्री दुपट्टे से बने फंदे से लटकी हुई थी। इस पर परिजनों के होश उड़ गए। घर में चीख पुकार मच गई। इस बीच किसी ने पुलिस को सूचना दी। सूचना पर लामाचौड़ चौकी प्रभारी सुशील जोशी मौके पर पहुंचे और घटना का जायजा लिया। कमरे की तलाशी लेने पर कोई सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ है। छात्रा के आत्मघाती कदम से परिजन सदमे में है। चौकी प्रभारी ने बताया कि परिजनों से पूछताछ की गई है, मौत के कारणों की जांच की जा रही है।
बदहवास हो गई मां
बेटी की मौत पर मां पार्वती देवी बदहवास हो गई। कहा कि बेटी ने सारे सपने तोड़ दिए। उनकी छोटी बेटी भावना जीजीआईसी में दसवीं में पढ़ती है जबकि बेटा रमेश दिल्ली में नौकरी करता है।
दो दिन पहले 15 साल के किशोर ने लगाई थी फांसी
भैया दूज पर मुखानी क्षेत्र में नीम के पेड़ के पास 15 साल के पूरन सिंह गोवाड़ी उर्फ पप्पू ने बहन की डांट पर फांसी लगाकर जान दे दी थी। वह यहां अपनी 24 साल की बहन रश्मि के साथ किराये के मकान पर रहती थी। बताया जा रहा है कि रश्मि ने पप्पू को दुकान में बंद कर दिया था लेकिन उसने पेटियां बांधने वाले प्लास्टिक की रस्सी से फंदा बनाकर जान दे दी थी। इधर एक दिन पूर्व भीमताल निवासी 24 वर्षीय इंजीनियर ओम प्रकाश ने भी जहर खाकर जान दे दी थी।
क्यों है अवसाद
मनोचिकित्सक डॉ. नेहा शर्मा के अनुसार आत्महत्या जैसा कदम उठाने वाले युवा नकारात्मक सोच से घिरे रहते हैं। उनमें आत्मविश्वास की कमी होती है। वह समाधान निकालने के बजाय आत्महत्या के विकल्प को चुन लेते हैं। अकेले रहना, सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताने से वह अपनी काल्पनिक दुनिया में ही जीने लग जाते हैं और वास्तविकता से भागने लगते हैं। उन्हें परिवार वाले ही दुश्मन नजर आते हैं। इसलिए वह अवसाद और तनाव का शिकार जल्दी हो जाते हैं।
क्या है समाधान
मनोचिकित्सक डॉ. नेहा शर्मा कहती हैं कि ऐसे युवाओं के मनोभाव को समझना बेहद जरूरी है, उन्हें सकारात्मक विचारों से ओत प्रोत किया जाए, अधिक से अधिक समय दिया जाए। जीवन के संघर्ष से सफलता की कहानी सुनाकर सहनशील बनने के लिए प्रेरित करना चाहिए। समस्याओं को शांतिपूर्वक समझ कर समाधान करना चाहिए। फिर भी व्यवहार में परिवर्तन नहीं हो तो तुरंत चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए। युवाओं को भी जिंदगी के महत्व को समझना चाहिए।