हल्द्वानी। ओखलकांडा में शैलनट संस्था के अध्ययन दल ने ग्रामीणों के सहयोग से तीन साल पहले जिन सात गुफाओं को खोजा था वे उपेक्षित पड़ी हैं। गुमनाम गुफाएं मिलने के बाद इनके संरक्षण और पर्यटन स्थल के रूम में विकसित करने के तमाम दावे धरे रह गए।
अक्तूबर 2014 में शैलनट के निदेशक डॉ. डीएन भट्ट की अगुवाई में अध्ययन दल ने ओखलकांडा के अधोड़ा डुंगरी ग्राम सभा के रानीकोट में घने जंगल में सात प्राकृतिक गुफाएं खोजी थी। इन गुफाओं में भगवान गणेश, शिव सहित अन्य देवी देवताओं की आकृतियां उभरी हुई थी। चूने के पत्थर के साथ ही गुफाओं में भूगर्भीय संरचनाएं बनी हुई थी। टीम के सदस्य और ग्रामीण 80 से 130 फीट गहरी पांच गुफाओं में तो पहुंचने में कामयाब रहे थे मगर अंधेरा होने की वजह से उन्होंने दो गुफाओं में जाने का जोखिम नहीं उठाया। टीम ने राजाकोट में चंद शासक द्वारा बनाए गए किले को भी खोजा था, जो खंडहर में बदल चुका था। गुफाओं के चर्चा में आने के बाद जनप्रतिनिधियों, पर्यटन, पुरातत्व और वन विभाग ने इस क्षेत्र को विकसित करने के दावे किए थे, लेकिन बात दावों से आगे नहीं बढ़ सकी।
डॉ. डीएन भट्ट कहते हैं कि राजाकोट के ऐतिहासिक 22 कक्षों के किले का निर्माण चंद शासक त्रिमल चंद ने 1636 में कराया था। गुफाओं के भीतर बनी देव आकृतियां पाताल भुवनेश्वर की गुफा से मिलती जुलती हैं। उनका मकसद था कि यह स्थल पर्यटन, ऐतिहासिक और धार्मिक रूप से विकसित हो। उन्होंने कहा कि अगर इस दिशा में कार्य नहीं होता है तो वे ग्रामीण, स्वयंसेवी संगठन के सहयोग से इसे विकसित करेंगे। अगले साल इस जगह यात्रा का भव्य वार्षिक आयोजन किया जाएगा।
कोट
ओखलकांडा में मिली गुफाओं के साथ ही देवगुरु मंदिर, छोटा कैलाश और हरीश ताल को पर्यटन की दृष्टि करने की कोशिश की जा रही है। इसके लिए पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज को लिखित में प्रस्ताव भी दिया है।
राम सिंह कैड़ा, विधायक भीमताल
इस संबंध में प्रशासन या स्थानीय लोगों का मेरे पास कोई पत्र नहीं आया है। पहले उन जगहों पर कार्य होता है, जिसका पत्राचार हुआ हो। विभाग मानव निर्मित जगहों को प्राथमिकता देता है। गुफाएं हजारों साल पुरानी होंगी। रूट पर जाकर गुफाओं को देखा जाएगा, तभी कुछ कह पाऊंगा। फिलहाल विभाग इस दिशा में कुछ नहीं हो रहा है।
डॉ. चंद्र सिंह चौहान, प्रभारी क्षेत्रीय पुरातत्व इकाई