हल्द्वानी। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने कहा कि संगठन में पंजीकृत कोई भी डॉक्टर या अस्पताल जैव चिकित्सीय कचरे को खुले में नहीं फेंक रहा है। संगठन ने कहा कि प्रशासन या नगर निगम के कर्मचारी के सामने जैव चिकित्सीय कचरे अस्पताल से सील होकर ग्लोबल कंपनी को दिया जाए।
सोमवार को कृष्णा हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में पत्रकारों से बातचीत में आईएमए के अध्यक्ष डॉ. अनिल अग्रवाल ने कहा कि झोलाछाप और पशु चिकित्सालयों के यहां से निकलने वाला जैव चिकित्सीय कचरा कहा जा रहा है। इसकी जांच होनी चाहिए। अस्पताल जैव चिकित्सीय कचरे को अलग करवाते हैं और रासायनिक शुद्धीकरण करने के बाद फेंकने के लिए देते हैं। डॉ. जेएस खुराना ने कहा कि बड़े अस्पताल बेड के हिसाब से और क्लीनिक किलो के हिसाब से ग्लोबल को हजारों रुपये महीने का भुगतान जैव चिकित्सीय कचरे के लिए करते हैं। हजारों रुपये महीने के देने के बाद अस्पताल ऐसी हरकत क्यों करेंगे। उन्होंने कहा कि जैव चिकित्सीय कचरा देने की वीडियोग्राफी अस्पतालों ने करानी शुरू कर दी है। प्रशासन, निगम या ग्लोबल के किसी व्यक्ति के सामने अस्पताल से कचरा निकलते ही सील कर दिया जाना चाहिए। डॉ. डीसी पंत ने कहा कि ग्लूकोज की बोतलें री साइकिल हो जाती है इसलिए इसको बेचने का कारोबार चल रहा है। प्रशासन को इस पर भी सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।
डॉ. पंत ने कहा कि ओपीडी का पर्चा कुछ समय बाद मरीज फेंक देते हैं, जबकि भर्ती मरीज की अस्पताल से छुट्टी होने पर डिस्चार्ज प्रमाण पत्र और दवाओं का पर्चा दिया जाता है। मरीज संबंधी इलाज की फाइल रिकार्ड रूम में रहती है ऐसे में रिकार्ड रूम की फाइल कैसे पहुंची ये जांच का विषय है। इस दौरान डॉ. मोहन सती, डॉ. पुनीत अग्रवाल, डॉ. अजय पांडे, डॉ. राहुल सिंह, डॉ. जेएस भंडारी, डॉ. महेश कुमार आदि थे।
जल्द शुरू होगा बार कोड और जीपीएस सिस्टम
हल्द्वानी। जैव चिकित्सीय कचरा निस्तारण के लिए केंद्र सरकार ने नियम मार्च 2016 में नया नियम लागू किया था। अस्पतालों से निकलने वाले कूडे़ के बैग को सील करके बार कोड लगाया जाएगा। साथ ही कूड़ा लेने के लिए आने वाली गाड़ी में जीपीएस सिस्टम लगा होगा। कूड़े के बैग को रास्ते में खोलना नामुमकिन होगा। इंस्टीनेटर पर पहुंचने के बाद ही बार कोड हटाया जाएगा। बार कोड हटने की सूचना आनलाइन प्रदूषण नियंत्रण विभाग के पास पहुंच जाएगी। डॉ. जेएस खुराना ने बताया कि इस सिस्टम को दो वर्षों में लागू करने के आदेश दिए गए थे। जैव चिकित्सीय कचरा लेने के लिए आने वाली गाड़ी की लोकेशन भी जीपीएस से प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को पता चल सकेगी। कूड़ा निस्तारण की आनलाइन जानकारी भी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को मिल जाएगी।