प्राचीन श्री रामलीला में 41 साल बाद ऐसा अवसर आया जब शहरवासियों भगवान श्रीराम, जानकी और लक्ष्मण को नाव में वास्तविक नाव में बैठकर डीके पार्क में पानी से लबालब बनाई गई नदी को पार करते देखा।
केवट ने श्रीराम को नदी पार कराई। नदी पार करते समय श्रीराम, लक्ष्मण, सीता नमो गंगे तरंगे पाप हारी का चौपाई का गायन कर रहे थे। इससे पहले 41 साल पूर्व भी इसी तरह वनवास के समय नदी पार कराने के दृश्य मंचित कराए जाते थे।
हरिशरणम जन प्रमुख रामगोविंद दास भाई जी ने 41 साल पुरानी परंपरा को दोबारा जीवंत कर दर्शकों को रोमांचित कर दिया। लीला मंचन में सुमंत द्वारा घर वापस चलने के राजा दशरथ के प्रस्ताव को श्रीराम ने ठुकरा दिया और उन्हें वापस भेज दिया।
सुमंत वापसी में विलाप करते हुए अवध में कह मुख ले जाऊं, कहूं क्या पूछें जब राजा कहते हुए वापस अयोध्या लौट आते हैं। इसके बाद भरत मिलाप का दृश्य मंचित किया गया। जिसमें भरत अयोध्यावासियों से साथ चित्रकूट में श्रीराम से मिलने जाते हैं और वहां श्री राम के खड़ाऊं लेकर वापस अयोध्या को आते हैं।
रामलीला कमेटी के संयोजक स्वामी राम गोविंद दास भाईजी ने बताया कि मंचन की जिम्मेदारी आने के बाद उन्होंने बुजुर्गों से राय ली थी। डीके पार्क के गंदे पानी को निकलवाने के बाद यहां नाव चलाने का निर्णय लिया गया। इसके लिए शंभू बाबा से नाव बनवाई गई।
41 साल पहले भी शंभू ने ही नाव तैयार की थी। नाव चलाने के लिए छह टैंकर पानी के साथ गंगाजल डाला गया। पानी शुद्ध करने के बाद केवट ने राम, लक्ष्मण, जानकी को बैठाकर नदी पार कराई। दृश्य को देखते ही महिला पुरुष, युवक खुश हो गए।
इस लीला के माध्यम से संदेश दिया गया कि बुजुर्गों ने लीला के लिए काफी परिश्रम किया था। राम केवट संवाद के बाद श्री राम को ठेले को नाव का रूप देकर नदी पार कराने का मंचन होता था। नाव से श्रीराम को नदी पार कराते समय युवक जय श्री राम का नारा उद्घोष कर रहे थे।
इधर. श्री रामलीला मैदान में राजा दशरथ राम के शोक में प्राण त्यागने का दृश्य मंचित किया गया। भरत-कैकेयी संवाद, राम-भरत मिलाप और चित्रकूट दर्शन की लीला दिखाई गई। आरती के बाद आज की दिन की रामलीला का समापन हुआ।