नैनीताल। 12 जून से शुरू होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा में यात्री धारचूला से लगभग 60 किमी आगे नजंग से पैदल चलकर मालपा, बुद्धि होते हुए गर्ब्यांग, नाभीढांग और फिर चीन सीमा लिपुलेख तक जाएंगे। इस मार्ग में बुद्धि से नाभीढांग तक 36 किमी सड़क वाहनों के लिए बन चुकी है लेकिन नजंग से बुद्धि तक 16 किमी मार्ग लंबे समय से निर्माणाधीन होने के बावजूद पूरा नहीं बन पाया है जिस कारण यात्रियों को कुल 69 किमी पैदल चलना पड़ेगा जबकि इसमें बुद्धि से नाभीढांग तक 36 किमी का वह मार्ग भी शामिल है जो वाहनों के लिए खुला है लेकिन इसमें कोई साधन उपलब्ध न होने के कारण यात्री पैदल ही जाते हैं।
कभी कभार सेना की कोई गाड़ी कुछ यात्रियों को लिफ्ट दे देती है लेकिन यह हमेशा नहीं हो पाता और तब भी 60 यात्रियों के दल में चुनिंदा को ही यह लाभ मिल पाता है। सड़क न होने के कारण पिछले वर्ष यात्रियों को पिथौरागढ़ से गुंजी हेलीकॉप्टर से ले जाने का प्रयास किया गया लेकिन यह सफल नहीं हो पाया क्योंकि अत्यधिक ऊंचाई पर होने के कारण गुंजी में अधिकतर कोहरा रहता है और उड़ान बाधित रहती है। नतीजतन एक ही दल के आधे यात्री गुंजी पहुंच गए और बाकी पिथौरागढ़ अटके रहे और कई दिन तक दल एकजुट नहीं हो पाया जबकि वीसा के कारण यात्रा निर्धारित दिनों में पूरी करनी होती है, जिस कारण इस प्रयोग से यात्रा पूरी होने में ही संशय हो गया। वर्ष 1982 से यात्रा के साथ जा रहे निगम कर्मी चंद्र सिंह राठौड़ ने बताया कि यदि नजंग से बुद्धि तक का 16 किमी मार्ग बन जाता तो यात्री सीधे लिपुलेख बेस तक गाड़ी से जा सकते और पैदल यात्रा और यात्रा के दिन दोनों ही कम हो जाते। चंद्र सिंह के अनुसार पिथौरागढ़ से गुंजी के बजाय बुद्धि तक हेलीकॉप्टर से ले जाना बेहतर विकल्प है।
निजंग से पैदल जाएंगे कैलाश मानसरोवर यात्री
16 किमी सड़क न बनने से 69 किमी चलेंगे पैदल
सड़क भी है गाड़ियां भी हैं पर पैदल यात्रा मजबूरी
नैनीताल। सरकारी योजनाएं किस लापरवाही से चलती हैं इसका उदाहरण है कैलाश मानसरोवर यात्रा का नजंग नाभीढांग मार्ग। बुद्धि नाभीढांग 36 किमी मार्ग तो बहुत पहले बन चुका है लेकिन नजंग बुद्धि के बीच 16 किमी मार्ग बनाया ही नहीं गया। मार्ग न होने से बुद्धि नाभीढांग मार्ग तक वाहन नहीं पहुंचाए जा सकते। इसके बावजूद केएमवीएन ने इस मार्ग पर यात्रा के लिए पांच वर्ष पूर्व 36 लाख की लागत से चार थार जीपें खरीद लीं। ये जीपें बुद्धि गर्ब्यांग नहीं पहुंच सकीं। सेना के वाहन तो वहां हेलीकॉप्टर से पहुंच गए लेकिन निगम ने हेलीकॉप्टर से ये जीपें पहुंचाने के प्रयास किये तो पता लगा कि इसमें 38 लाख रुपये खर्चा आएगा। फिर बार बार ईंधन पहुंचाने या रिपेयर के लिए जीप वापस लाने का खर्च कई गुना और हो जाता। ऐसे में बगैर इन तथ्यों पर गौर किये ये जीपें क्यों खरीदी गईं इसका किसी के पास जवाब नहीं है। निगम के महाप्रबंधक अशोक जोशी ने बताया कि इतनी राशि न होने के कारण इन जीपों को नाभीढांग ले जाना संभव न होने के कारण निगम फिलहाल एक-एक जीप कॉर्बेट पार्क और बिनसर में चला रहा है और दो निगम मुख्यालय नैनीताल में प्रयुक्त की जा रही हैं।