रानीखेत (अल्मोड़ा)। काश्तकारों की आय दोगुनी करने के नारों में कितना दम है इसका अंदाजा मनेला गांव को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है। खेतों की सिंचाई के लिए 1982 में बनी हाइड्रम योजना अब पूरी तरह से निरर्थक साबित हो रही है। आठ साल पूर्व अतिवृष्टि में हाइड्रम का बांध बह गया था, तब से इसकी सुध नहीं ली गई है। ग्रामीणों के सहयोग से बना वैकल्पिक बांध भी दो माह पूर्व अतिवृष्टि की भेंट चढ़ गया। सिंचाई के अभाव में अब ग्रामीणों के खेत बंजर हो रहे हैं।
द्वाराहाट तहसील के अंतर्गत मनेला गांव अनाज उत्पादन के लिए मशहूर है, यहां धान के अलावा तमाम तरह की सब्जियों का प्रचुर मात्रा में उत्पादन होता है। ग्रामीण अनाज उत्पादन के माध्यम से आजीविका चलाते हैं। इधर 1982-83 में खेतों की सिंचाई के लिए लघु सिंचाई विभाग द्वारा हाइड्रम योजना बनाई गई।
लंबे समय तक सुचारु रूप से चलने के बाद आठ साल पहले अतिवृष्टि में हाइड्रम का बांध बह गया। ग्रामीणों ने बार-बार तंत्र से गुहार लगाई, लेकिन सुनने को कोई तैयार नहीं हुआ। ग्रामीणों के सम्मुख सिंचाई के लाले पड़ गए, खेत बंजर होने शुरू हो गए। इसके बाद ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से यहां एक कच्चा बांध बनाया।
2017 की अतिवृष्टि में बांध और गूल टूट गई। प्रधान उमेद सिंह ऐरड़ा ने बताया कि इसके बाद फिर विभाग से गुहार लगाई गई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। चार साल पूर्व ग्रामीणों के सहयोग से फिर अस्थायी बांध बनाया गया, यह दो माह पूर्व चार अप्रैल को फिर से बह गया। बीडीसी बैठक में भी उन्होंने इस मसले को उठाया। लेकिन विभाग ने बजट नहीं होने की बात कह दी।