हल्द्वानी। किसी लेखक का ख्वाब, किसी के लिए सवाल तो किसी के लिए सवालों का जवाब। इतने रंग रूप वाली किताब आज हाशिये पर है। हल्द्वानी के पुस्तकालयों का हाल देखा जाए तो कहीं पढ़ने वाले नहीं है और कहीं दीमक किताबों को पढ़ रही हैं। पहले रात में सोते वक्त युवाओं की छाती में किताब सोया करती थी। अब यह जगह मोबाइल ने ले ली।
शहर में स्थित नगर निगम के पुस्तकालय अब सूना रहता है। रोडवेज बस अड्डे के समीप 1953 में बना पंडित गोविंद बल्लभ पुस्तकालय आज अपने को कोसता नजर आता है। सीलन, गाड़ियों के शोर के बीच फंसी किताबें आज भी सोचती हैं कि लोग आएं तो उनमें जमा धूल साफ हो। नगर निगम को यहां रखीं गईं लगभग दो हजार किताबों के प्रति थोड़ी दया भी नहीं आती। कुछ शौकीन यहां पुराने उपन्यास, अखबार और मासिक पत्रिका पढ़ने जरूर आते हैं।
यही हाल काठगोदाम, रानीबाग मार्ग पर निगम के पुस्तकालय का भी है। कुछ किताबें तो हैं मगर पढ़ने वाले लोग नहीं है। बनभूलपुरा स्थित मौलाना हकीमुल्ला सालाें पुराना नगर निगम का पुस्तकालय है। सात-आठ वर्षों से यह जीर्णोद्धार की राह तक रहा है। दो बार बोर्ड बैठक में प्रस्ताव पारित हुआ और दोनों बार ही पैसा लौट गया। हिंदी, अंग्रेजी और उर्र्दू के तमाम कीमती साहित्य को दीमकों ने चाट डाला और अब महज दो कमरों में पुस्तकालय सिमट गया है। कहना न होगा कि बिखर बिखर सी गई है किताबों की सांसें, ये कागजात खुदा जाने कब कहां उड़ जाएं।
शहर के बड़े पुस्तकालय
पंडित गोविंद बल्लभ पुस्तकालय, रोडवेज बस अड्डे के पास, 1953 स्थापित
मौलाना हकीमुल्ला पुस्तकालय, ताज चौराहे के पास बनभूलपुरा, 1985 स्थापित
पुस्तक मेलों में भी लोग ई बुक्स मांगते हैं, जिसकी वजह है सूचना क्रांति का दौर। नेट काफी सस्ता और सुगम हो गया है जिसकी वजह से लोगों के कदम अब पुस्तकालय में नहीं जाते। वर्चुअल जमाना है शायद इसलिए किताबों के डिजीटलाइजेशन की भी जरूरत आ पड़ी है।
- मोहन चंद्र कबड्वाल साहित्यकार, निवासी प्यूड़ा, रामगढ़ ब्लॉक, नैनीताल
सोशल मीडिया और भौतिकवाद की ओर भाग रही आज की पीढ़ी को इतिहास, समाजवाद और साहित्य के प्रति दिलचस्पी नहीं है। हर चीज के लिए गूगल पर जाने वाली पीढ़ी पुस्तकालय की ओर जाए, जब एक क्लिक में सारा काम आसान हो जा रहा है।
- मो. यूसुफ एडवोकेट, साहित्यकार हल्द्वानी