हल्द्वानी। जंगल की हरियाली को आग से बचाने के लिए हरियाली को ही हथियार बनाया जाएगा। वन अनुसंधान केंद्र ने औंस घास पर शोध किया है। यह घास आग को काबू करने में मददगार है। लालकुआं नर्सरी में सफल प्रयोग के बाद अनुसंधान इस घास को जैविक अग्निरोधी उपकरण की तरह इस्तेमाल करने की तैयारी कर रहा है।
ग्रेमिनेएसी कुल की औंस घास का वानस्पतिक नाम थौरिया मैंगरिना है। तीन-चार फिट लंबी इस घास में हरित पदार्थ अत्यधिक मात्रा में पाया जाता है। सदाबहार हरी रहने वाली यह घास फायर सीजन की अवधि में विशेषकर फरवरी से जून तक हरी रहती है। इसकी जड़ काफी गहरी होती हैं। यदि आग की लपटें घास तक पहुंचती हैं तो हरियाली के कारण वह घास को पार नहीं कर पाती है।
यह घास 1200 से 1500 मीटर पर भी आसानी से उग जाती है। यदि जंगलों में चारों ओर और जंगल से आबादी के बीच सुरक्षा दीवार की तरह इस औंस घास को रोपा जाए तो आग को आसानी से काबू में किया जा सकता है।
अनुसंधान ने लालकुआं नर्सरी में दावानल को काबू के लिए प्रयोग भी किया। सफलता मिलने के बाद अब इसकी पौध तैयार कर जंगलों में लगाने के लिए प्रस्ताव वन प्रभागों को भेजने की तैयारी में है।
भू-क्षरण रोकने में भी है मददगार
औंस की जड़ें भूमि में काफी गहरी होती हैं, एक बार घास लगने पर स्वयं पनपने लगती हैं। इससे भू-क्षरण रोकने में भी काफी मददगार होती है। वन अनुसंधान पर्वतीय इलाकों में भू-क्षरण वाले इलाके में भी रोपने की तैयारी कर रहा है।
औंस घास में हरित पदार्थ प्रचुर मात्रा में है। तीन-चार फिट लंबी इस घास की जड़ें काफी गहरी होती हैं, इसकी वजह से आग पर काबू पाया जा सकता है। इस घास को काफी संख्या में रोपा जा रहा है।
- मदन सिंह बिष्ट, प्रभारी रेंजर, वन अनुसंधान केंद्र हल्द्वानी।